1857 की क्रांति से जोड़कर देखने वालों के भी दो धड़े थे। एक धड़ा मानता था कि कंकाल पंजाबी सैनिकों के हैं। दूसरा धड़ा उन्हें मियां मीर छावनी लाहौर में तैनात 26वीं देशी पैदल सेना रेजिमेंट के सैनिक मानता था। पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के एक मानवविज्ञानी डॉ. जेएस सहरावत ने बताया कि सैनिक कहां के थे, यह जानने के लिए स्टेबल आइसोटोप तकनीक से 85 नमूनों का विश्लेषण किया गया।
इसके अलावा 50 नमूनों का डीएनए विश्लेषण भी किया गया। विभिन्न एतिहासिक, फोरेंसिक व अन्य वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर सहरावत ने दावा किया है कि कुए से मिले कंकाल गंगा के मैदानी इलाकों के रहने वाले सैनिकों के हैं। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, बंगाल व ओडिशा के निवासी थे।
शोधदल से जुड़े सीसीएमबी हैदराबाद के निदेशक वैज्ञानिक डॉ. के थंगराज ने बताते हैं कि डीएनए विश्लेषण लोगों के वंश को समझने में मदद करता है, और आइसोटोप विश्लेषण भोजन की आदतों पर प्रकाश डालता है। दोनों शोध इस बात का समर्थन करते हैं कि कुएं में मिले मानव कंकाल पंजाब या पाकिस्तान में रहने वाले लोगों के नहीं थे। बल्कि, डीएनए अनुक्रम यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मेल खाते हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग शाकाहारी थे।
1857 के दौरान पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर ने अपनी किताब द क्राइसिस ऑफ पंजाब 1857 में पंजाब में हुए नरसंहार के बारे में लिखा भी है कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था, क्योंकि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी। काफी प्रयास के बाद 2014 में यह कुआं मिला था।
शोध प्रकाशन रोकने की हुई कोशिश
शोध टीम के सदस्य बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि आम तौर पर कोई शोध पत्र छपने के पहले उसका रिव्यू किया जाता है। इसमें कम से कम एक एडिटर और दो विशेषज्ञ होते हैं। यह शोध पत्र जब प्रकाशित होने के लिए गया तो एडिटर अंग्रेजी मूल के थे और उन्होंने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाए। ऐसा इसलिए कि दोनों विशेषज्ञों ने इसे अच्छी स्टडी बताने के साथ ही यह भी कहा कि शोध सभी मानको को पूरा करती है।
प्रो. चौबे ने बताया कि इस अध्ययन के निष्कर्ष भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों के इतिहास में एक प्रमुख अध्याय जोड़ देंगे। यह अध्ययन दो बातों की पुष्टि करता है। पहली, कुएं से जो कंकाल मिले हैं, वे 1857 की क्रांति के दौरान शहीद हुए सैनिकों के हैं। दूसरी बात यह कि कंकाल पंजाब से नहीं, बल्कि गंगा के मैदान से संबंध रखते हैं। टीम के प्रमुख शोधकर्ता और प्राचीन डीएनए के एक्सपर्ट डॉ. नीरज राय ने कहा कि टीम द्वारा किया गया वैज्ञानिक शोध इतिहास को साक्ष्य-आधारित तरीके स्थापित करने में मदद करता है।
1857 में पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर ने अपनी किताब द क्राइसिस ऑफ पंजाब में 1857 में पंजाब में हुए इस नरसंहार का वर्णन किया है। पंजाब की एक शोधार्थी जब इंग्लैंड गईं तो उन्होंने इस किताब को पढ़ा। पुस्तक में कई चौंकाने वाली बातें लिखी थीं। लिखा था कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था।
साथ ही लिखा था कि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी, लेकिन यह असली देशभक्त थे जो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रहे थे। इस कुएं को काफी प्रयास के बाद खोजा गया और तमाम सैनिकों के अवशेष मिले। इनकी जांच पंजाब विश्वविद्यालय के एन्थ्रोपोलाजिस्ट डॉ. जेएस सेहरावत को सौंपी गई।
वर्ष 2014 से वह लगातार इन अवशेषों पर जांच कर रहे हैं और चौंकाने वाले खुलासे कर रहे हैं। इन सैनिकों की पहचान करके उनके परिजनों को अवशेष देना उनका उद्देश्य है, ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। डॉ. जेएस सेहरावत ने इन कंकालों का डीएनए और आइसोटोप अध्ययन, सीसीएमबी हैदराबाद, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट लखनऊ और बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो.ज्ञानेश्वर चौबे के साथ ही मिलकर किया।