ठुमरी गायिका पद्म विभूषण गिरिजा देवी के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है। उनके निधन से बनारस की गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक शोक की लहर है। लोग उन्हें याद कर रहे हैं, श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
ठुमरी गायक पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र ने कहा कि गिरिजा देवी के सुरों में दमकशी और बेजोड़ लालित्य का समागम था। वह बनारस घराने की प्रतिनिधि गायिका थीं। सुरों का ऐसा साधक बार-बार नहीं पैदा होता है। उनकी जगह कोई नहीं भर पाएगा। गिरिजा देवी के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है।
पद्मभूषण पं. राजन मिश्र ने कहा कि शास्त्रीय संगीत के इस युग का आज सबसे दुखद दिन है। गिरिजा देवी जी सिर्फ एक गायिका ही नहीं थी, उन्होंने बनारसी ठुमरी को पूरे विश्व में एक अलग पहचान दिलाकर बनारस घराने का गौरव बढ़ाया था। वह प्रेम की प्रतिमूर्ति थी, उन्होंने किसी से कोई अपेक्षा नहीं की बल्कि सबको अपने संगीत का ज्ञान बांटा।
पद्मभूषण पं. साजन मिश्र ने कहा कि वे हिंदुस्तान के संगीत की शान थीं और उनका असमय चला जाना असहनीय है। वह हिंदुस्तान की ठुमरी की मल्लिका थीं। गिरिजा देवी जैसी कोई गायिका ना थी, ना है और ना होगी। उनके निधन से गुरु-शिष्य परंपरा की कड़ी को बड़ा तगड़ा झटका लगा है।
ठुमरी गायिका पद्मश्री सोमा घोष ने कहा कि अप्पा जी बनारस घराने की गायकी की तपस्या की प्रतिमूर्ति थीं। गायकी उनकी साधना थी और सांस को बांधने का उनके अंदर जो दम था वह बेजोड़ था। उन्होंने कई बार कहा था कि सोमा मैं तुमसे कुछ भी नहीं लूंगी, तुम सिर्फ मेरे पास आ जाओ। उन्होंने जितना प्यार दिया उतना संगीत जगत में किसी से नहीं मिला।
मां-दादी के विरोध के बावजूद शुरू किया गाना
गिरीजा देवी
गिरिजा देवी ने गायन की शुरुआत आल इंडिया रेडियो इलाहाबाद से 1949 से की थी। 1946 में उनकी शादी हो गई थी लेकिन उन्हें गायन के लिए अपनी मां और दादी के विरोध का सामना करना पड़ा। दरअसल, उस समय माना जाता था कि उच्च वर्ग की किसी महिला को सार्वजनिक रूप से गाना नहीं गाना चाहिए। हालांकि 1951 में बिहार में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक संगीत कार्यक्रम दिया।
1980 के दशक में कोलकाता में आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी और 1990 के दशक के दौरान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के एक सदस्य के रूप में काम किया। उन्होंने संगीत विरासत को संरक्षित करने के लिए कई छात्रों को पढ़ाया।
संगीतज्ञ पिता के घर हुआ था जन्म
गिरिजा देवी का जन्म आठ मई, 1929 को जमींदार रामदेव राय के घर हुआ था। गिरिजा देवी के पिता हारमोनियम बजाया करते थे और उन्होंने गिरिजा देवी को संगीत सिखाया।
बाद में उन्होंने गायक और सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्रा से खयाल और टप्पा गायन की शिक्षा लेनी शुरू की। नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने फिल्म याद रहे में अभिनय भी किया और अपने गुरु श्रीचंद मिश्रा के सानिध्य में संगीत की विभिन्न शैलियों की पढ़ाई जारी रखी।
नियति ने तोड़ दिया ठुमरी की आखिरी प्रस्तुति का वादा
गिरिजा देवी
- फोटो : self
ठुमरी गायिका पद्म विभूषण गिरिजा देवी जीवन के अंतिम समय तक सुरों के साथ रहीं। राग और बंदिश की साधना उनके लिए ओढ़ने बिछाने जैसा था। वह अपने निधन के कुछ घंटे पहले तक तबला सम्राट पं. किशन महाराज के जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित संगीत समारोह की तैयारी को लेकर फिक्रमंद थीं लेकिन शायद ईश्वर को ये मंजूर नहीं था।
29 अक्तूबर को पुणे में प. किशन महाराज की याद में आयोजित संगीत समारोह में ठुमरी गायिका को प्रस्तुति देनी थी। यह जानकारी मंगलवार की रात पद्मविभूषण पं. राजन मिश्र ने अमर उजाला से साझा की। उन्होंने बताया कि वह महीने भर से पं. किशन महाराज की याद में पुणे में होने वाले संगीत समारोह को लेकर उत्साहित थीं। उस समारोह में गिरिजा देवी के साथ राजन मिश्र को प्रस्तुति देनी थी।
इसके लिए हवाई जहाज को टिकट करा लिया गया था। राजन मिश्र ने बताया कि वह एक मात्र ऐसी कलाकार थीं जिनके भीतर संगीत पूजा के रूप में समाहित था। वह संगीत ये जुड़े किसी भी आग्रह को ठुकराती नहीं थी। उनकी तबीयत खराब थी लेकिन जब उनके सामने प्रस्ताव आया कि पं. किशन महाराज की याद में संगीता समारोह आयोजित किया गया है तो उन्होंने मुस्कुराते हुए राजन मिश्र से कहा था कि ईश्वर पता नहीं क्या करेगा।
जीवन का कोई ठीक नहीं लेकिन वह कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। टिकट करा दीजिए वह कार्यक्रम में खास ठुमरी पेश करेंगी। इसके लिए वह तैयारी भी कर रही थीं लेकिन तीन दिन पहले अचानक बीमारी के चलते अस्पताल जाना पड़ा। अंतत: वह हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गईं।