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तिलमापुर के टीले पर उगे पेड़, पुरातत्व विभाग के इंतजाम ढेर

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पुरातात्विक धरोहर की बाउंड्री से 100 मीटर के दायरे में नियमानुसार जहां फावड़ा नहीं मार सकते, वहां मकान बन चुके हैं। ये हाल है सारनाथ क्षेत्र स्थित तिलमापुर टीले का। जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया है।
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यहां पर पुरातत्व की खोदाई में मिट्टी के बड़े-बड़े कलश मिले। इनको संरक्षित किया गया और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया था। राष्ट्रीय धरोहर होने के बावजूद लापरवाही और उपेक्षा के कारण तिलमापुर के टीले का अस्तित्व अब समाप्ति की ओर है। चारों तरफ हो रहे निर्माण व अतिक्रमण के कारण टीला अब लोगों की नजरों से धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है। टीले पर झाड़ियां व नीम के पेड़ उग आए हैं। पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण व बचाव के लिए कोई इंतजाम नहीं किया है। इंतजाम के नाम पर सिर्फ सूचना बोर्ड लगाकर छोड़ दिया गया है। बोर्ड पर लिखा हुआ है कि यह राष्ट्रीय धरोहर है। इसके 100 मीटर के निषिद्ध क्षेत्र में कोई भी निर्माण, खोदाई कार्य नहीं होगा।
पुरातत्व के ये हैं नियम
पुरातात्विक अवशेष की बाउंड्री से 100 मीटर के दायरे में कोई निर्माण नहीं हो सकता है। बाउंड्री से 300 मीटर के दायरे में साढ़े सात मीटर ऊंचाई की अनुमति निर्माण के लिए मिलती है। गिने-चुने लोग ही 100 मीटर के बाहर निर्माण करने का अनापत्ति प्रमाणपत्र पुरातत्व विभाग से लेते हैं। यह एनओसी दिल्ली से मिलती है।
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यहां हैं पुरातात्विक धरोहर
सारनाथ में धम्मेख और चौखंडी स्तूप, तिलमापुर में टीला, राजघाट में लाल खां का मकबरा, राजेंद्रघाट पर मान महल आदि।
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