बीएचयू महिला महाविद्यालय में संगीत की शिक्षिका रहीं प्रो. मंगला कपूर की आत्मकथा ‘सीरत’ पर रविवार को हुई परिचर्चा में उन्होंने संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी सुनाई। काशी कला कस्तूरी के फेसबुक पूज पर हुई ऑनलाइन परिचर्चा में प्रो. कपूर ने कहा कि जले हुए चेहरे कारण ही न केवल बीएचयू परिसर में सेवा के दौरान भी सहयोगियों ने भी अलग नजरिए से देखा। बीएचयू समेत कई जगहों पर लोगों की प्रताड़ना सहनी पड़ी।
परिचर्चा में प्रो. मंगला कपूर ने कहा कि केवल साढ़े ग्यारह वर्ष की उम्र में एसिड अटैक के कारण बुरी तरह जख्मी होने के बाद मैंने सारी आशाएं छोड़ दी थीं मगर माता-पिता ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी।कुछ ऐसे रिश्तेदार भी थे, जिन्होंने यह सलाह भी दी कि लड़की बुरी तरह जल चुकी है, इसका जीना न जीना बराबर है। बेहतर होगा इसे जहर का इंजेक्शन लगवा दो।
प्रो. कपूर ने कहा कि ‘सीरत’ को पुस्तक का रूप देने में मेरा सर्वाधिक सहयोग मेरी सखी डॉ.चंद्रकला त्रिपाठी ने किया। पटना मेडिकल कॉलेज में प्रो. कपूर का ऑपरेशन करने वाले डॉ. एचएस. शुक्ला और महिला महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्य डा. चंद्रकला त्रिपाठी ने कहा कि तेजाब में जलती हुई बचपन की देह अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े 18 साल की हो गई। मुंबई से शास्त्रीय गायिका पद्मश्री सोमा घोष और एएम. हर्ष ने बीस अध्याय वाली कृति सीरत के सबसे छोटे किंतु सबसे मार्मिक अध्याय ‘टूटे पंखों पर आकाश’ का पाठ किया। सत्र की संचालक डा. शबनम खातून ने प्रो. मंगला कपूर की कविताओं का वाचन भी किया।