फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विष्णु के चक्र से निकला कुंड बदहाल

Thu, 23 Jun 2016 02:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
विज्ञापन
मरणं मंगलं यत्र सफलं यत्र जीवनम, स्वर्गिस्त्रणायते यत्र सैषा श्री मणिकर्णिका।
विज्ञापन

स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णित इस श्लोक के अनुसार मणिकर्णिका चक्र पुष्करणी कुंड की महिमा पृथ्वी के सभी तीर्थों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ है। इसका अर्थ है कि जहां मृत्यु मंगलकारी हो, जीवित रहना सफल हो और स्वर्ग सुख इसके आगे तिनके के समान हो, वो काशी का अनादि और प्रधान तीर्थ मणिकर्णिका चक्रपुष्करणी है। काशी के इस अनादि तीर्थ कुंड में जहां देश भर से श्रद्धालु डुबकी लगाने के साथ ही दुखों से उबरने के लिए आते हैं, उसको मौजूदा समय में संरक्षण की दरकार है।


काशी में एक ऐसा कुंड भी है, जिसे चराचर जगत के स्वामी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से खोदा था। कहते हैं कि कभी तांडव नृत्य के दौरान भगवान शिव की कर्णमणि इसी स्थान पर गिरी थी। उसी स्थान पर भगवान विष्णु ने शिव का ध्यान लगाया था। वह अनादि तीर्थ मणिकर्णिका चक्रपुष्करणी इन दिनाें बदहाल है। कहने को तो इस कुंड की सफाई के लिए पंप भी लगा है लेकिन महीनों से इसका पानी बदला नहीं गया। इस वजह से यहां पर गंदगी का अंबार है।
विज्ञापन
विज्ञापन



मणिकर्णिका चक्रपुष्करणी काशी का अनादि तीर्थ होने के साथ ही सनातन धर्मियों के आस्था का केंद्र भी है। पड़ोसी देश नेपाल, इंडोनेशिया और भूटान तक के श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और स्नान कर पुण्य के लिए यहां आते हैं। अक्षय तृतीया के दिन अक्षय पुण्य की डुबकी लगाने के लिए इस कुंड पर मेला भी लगता है। हजारों की तादाद में काशीवासी ही नहीं देश के कई हिस्सों के श्रद्धालु मणिकर्णिका देवी का दर्शन कर इस कुंड में स्नान करते हैं। मान्यता है कि वर्ष में एक बार अक्षय तृतीया के एक दिन पहले इस कुंड की शिल्ट निकाली जाती है। इसके बाद अपने श्रोतों से इसमें धवल जल भर जाता है। उस जल को संचित करने की लोगों में होड़ मची रहती है। वैसे इस कुंड की सफाई और संरक्षण की जिम्मेदारी काशी के तीर्थ पुरोहित समाज के ऊपर है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें