ठुमरी का नाम लिजिए तो ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी का चेहरा ही सबसे पहले सामने आता है। चैती होगी, ठुमरी होगी और सुरों पर साज भी सजेंगे लेकिन नहीं होंगी तो सिर्फ गिरिजा देवी। होंगी तो सिर्फ और सिर्फ उनकी स्मृतियां। संगीत वैसे भी बनारस के कण-कण में बसता है।
परिवार बनारस आया और अप्पा जी संगीत में रम गईं, फिर तो बनारस कभी उनके भीतर से नहीं निकला। उनकी गायकी का रंग भी बनारस में डूबा दिखता है। चाहे वो ठुमरी हो, दादरा, कजरी, चैती या होरी। वो कहती थीं कि बनारस और गंगा के ही इर्द-गिर्द उनकी जिंदगी घूमती है।
यह कहना है अप्पाजी के भतीजे प्रकाश सिंह का। उनका जाना हम लोगों के लिए सबसे दुखद था। वह तो हमारी मां थीं। अप्पाजी यानी गिरिजा देवी ने 24 अक्टूबर की रात इस दुनिया को विदा कह दिया था। 1972 में पद्मश्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित अप्पा जी के लिए गायन दरअसल पूरी जीवन शैली का नाम था।
अप्पा जी एक जमींदार परिवार से थीं। उनके परिवार ने उनकी रुचि देखी और संगीत सीखने का मौका दिया। वैसे भी घर में उन पर ऐसी कोई बंदिश नहीं थी, जो तमाम परिवार लड़कियों पर लगाते हैं।
दिलचस्प है अप्पाजी की कहानी
पद्मभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र ने बताया कि उनके अप्पाजी कहे जाने की कहानी भी दिलचस्प है, दरअसल, उनकी बहन का बेटा जब छोटा था, तो उन्हें अप्पाजी कहता था। उसके साथ बाकी लोग भी कहने लगे और धीरे-धीरे वो सभी की अप्पाजी हो गईं। उन्होंने एक फिल्म में भी काम किया था। इसका नाम था याद रहे। उन्हें इसके लिए महात्मा गांधी ने सराहा था, तब वो महज 10 साल की थीं। भले ही उसके बाद वो फिल्मों से दूर हुईं, लेकिन सराहे जाने का दौर जारी रहा।