पंचगव्य चिकित्सा को शोध और साक्ष्य से बढ़ावा देने की जरूरत
-बीएचयू आयुर्वेद संकाय में दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन
माई सिटी रिपोर्टर
वाराणसी। बीएचयू आयुर्वेद संकाय के कायचिकित्सा विभाग और गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने पंचगव्य चिकित्सा से बीमारियों के उपचार के साथ ही अन्य बिंदुओं पर चर्चा की। इस दौरान वर्धा के मेघे इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज के डॉ. मनीष देशमुख ने कहा कि पंचगव्य चिकित्सा को शोध और साक्ष्य से बढ़ावा देने की जरूरत है।
आयुर्वेद संकाय के शताब्दी कृषि सभागार में आयोजित संगोष्ठी के अंतिम दिन रविवार को डॉ. मनीष देशमुख ने कहा कि पंचगव्य प्रभावी है, इससे कई तरह की बीमारियों के उपचार में मदद मिलती है। उन्होंने एक वेबसाइट के बारे में भी बताया, जिसमें पंचगव्य पर शोध का भंडार है। अनुराग कॉलेज ऑफ फार्मेसी, भंडारा के प्रिंसिपल डॉ. संजय वाते ने त्वचा रोग की समस्या पर गोमूत्र के प्रभावों की जानकारी दी। प्रोफेसर गोपाल नाथ ने भी पंचगव्य चिकित्सा के अनुसंधान पहलू पर जोर दिया। गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र, देवलापार के सुनील मानसिंहका ने इस तरह के आयोजनों को चिकित्सकों के साथ ही मरीजों के लिए उपयोगी बताया। प्रोफेसर ओपी सिंह ने भी आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच सामंजस्य की बात कही।
मरीज को चिकित्सा लाभ पहुंचाने में सक्षम है भस्म
बीएचयू आयुर्वेद संकाय के प्रोफेसर आनंद चौधरी ने कहा कि स्वर्ण भस्म की चंपक रंग, रजत भस्म की काले रंग की भस्म ही मानव को चिकित्साकीय लाभ पहुंचाने में सक्षम है। 2015 से 2017 तक चिकित्सा क्षेत्र में नोबल पुरस्कार आयुर्वेद के सिद्धांतों पर आधारित रहा। जिन्हे पश्चिमी, चाइनीज और जापानी वैज्ञानिकों ने प्राप्त कर मान बढ़ाया। शोध जारी रहा तो 2047 तक भारतीय वैज्ञानिक को नोबेल भी मिल सकता है।