वाराणसी में गंगा महोत्सव का दूसरा दिन
गंगा के सुरम्य तट पर शनिवार की रात उत्तर-दक्षिण के लोक से लेकर शास्त्र तक में रचे -बसे थिरकन के भाव एकाकार हुए। पद्मश्री माधवी मुद्गल ने अपनी शिष्याओं के साथ ओडिसी नृत्य में भाव-भंगिमाओं से जहां शिव से लेकर कान्हा के रास तक के भावों को थिरकन में अभिव्यक्त किया, वहीं हरियाणा के घूमर लोक नृत्य में फाग के रंग इस कदर छाए कि लोग विभोर हो उठे। पंजाबी भांगड़ा की चासनी से इसमें चार चांद लगाया पंजाब के नर्तकों ने। गीतों, गजलों से शाम नहाई तो लोक वाद्यों की गूंज पर झूमती रही। संत रविदास घाट पर गंगा महोत्सव की दूसरी निशा का नजारा ऐसा ही था।
शाम सात बजे दीप प्रज्ज्वलन के बाद शुरुआत हुई लेखपाल धुर्वे और समूह के गुदम्बबाजा से। मध्य प्रदेश के डिडोरी जिले की ढोलिया जनजाति का यह पारंपरिक वाद्य जब गंगा के तट पर तालबद्ध हुआ तो लोगों की आंखें खुली रह गईं और मन-मिजाज मुग्ध हो गया। इस लोक वाद्य को तीज त्योहारों के अलावा मड़ई मेला,विवाहोत्सवों पर खास तौर से बजाया जाता है। लेखपाल के साथ धन सिंह धुर्वे, रति राम, उमेश भुमार, बिसाहू लाल, हीरालाल , मसराम, मंसा राम,खेमराज ने गुदुब्ब पर ताल मिलाए। इनके बाद मंच पर आई ऋषि मिश्र और वरुण मिश्र की जोड़ी। राग मिश्र चारुकेशी की इन्होंने अवतारणा की। गमक और मीड़ के साथ बंदिश की अलापचारी में इन्होंने चार चांद लगाया।
इसके बाद राग नट भैरव में भी एक बंदिश पेश की। तबले पर पं. कुबेर नाथ मिश्र, सारंगी पर अनीश मिश्र ने संगत की। पद्मश्री माधवी मुदगल ने ओडिसी नृत्य के भावों में शिव स्तुति से लेकर गंगा की पावन लहरों की कलकल छलछल तक का एहसास कराया। आशुतोष श्रीवास्तव की गजलें सराही गईं। इनके बाद हरियाणा के कामिल एवं समूह के घूमर नृत्य में युवक-युवतियों ने लट्ठमार होरी की बेहतरीन प्रस्तुति की। महिलाएं घाघरा-चोली में और पुरुष धोती-कुर्ती और साफा में थे। ढोलक, मृदंग, मोरचंग जैसे वाद्यों पर फाग गीतों के बोल गूंजे तो इस समूह की थिरकन यादगार बन गई। अंत में पंजाब का भांगड़ा रुपिंदर सिंह और समूह ने पेश किया तो लोग थिरकने लगे। लुंगी और पगड़ी बांधे पंजाबी युवकों ने घेरा बनाकर भांगड़ा किया। बोलियों, तालियों का समन्वय देखने लायक था।