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बनारस से दिल का रिश्ता जापानी बाजारों तक फैला

Fri, 04 Dec 2015 01:35 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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बनारस की गलियों में प्यार पाने वाली जापानी बालाओं ने दिलों के जरिए बाजार को भी रोजगार की उम्मीदों से जोड़ दिया है।
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 मसलन घाटों की सीढ़ियों, नावों की पतवारों से शुरू होने वाले यह रिश्ते सिर्फ मुहब्बत के अफसानों तक सिमटे नहीं, बल्कि टोक्यो, कोबे, चिबा जैसे शहरों में रोजगार के नए अवसरों के रूप में छाते देखे जाने लगे हैं।
 पशुओं के सींग, चिड़ियों के पंख से काशी में बनने वाली कान की बालियां हों या फिर उन्हीं गलियों में धागों से बुने जाने वाले ब्रेसलेट और डिजाइनर पर्स।
 हाथ से तैयार इन वस्तुओं को यह लड़कियां जापानी बाजार में उतारने लगी हैं। आकर्षण इस तरह बढ़ा है कि गांधी के चरखे से निकली खादी के परिधान भी वहां की नई पीढ़ी की पसंद बनने लगे हैं।
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काशी घूमने आने वाली जापानी बालाएं बनारस को नया बाजार भी मुहैया करा रही हैं। इस हकीकत की जीती जागती मिसाल हैं टोक्यो से महज 50 किमी दूर कस्बाई इलाके चिबा की रहने वाली आईया यू।
तीन साल पहले यहां घूमने आईं आईया को बनारसी माहौल में इस कदर अपनापन मिला कि वह इन्हीं गलियों में रम गईं।
उन्होंने अपने जापानी दोस्तों के साथ घाटों पर ही नाव खेने वाले मल्लाहों और दीया, फूल बेचने वाली गरीब परिवार की लड़कियों से ब्रेसलेट, नेकलेस बनाना सीखा।
अब उन्होंने चिबा शहर में ही बनारस की वस्तुओं की दूकान खोल ली है। उनकी दूकान में बनारस की मोतियों से बनने वाले आर्टिफिशियल ज्वेलरी, सींग की बालियां, पत्थर से तैयार गले के हार के अलावा पर्स खूब बिकते हैं।
आईया छह महीने दशाश्वमेध, खालिसपुरा, बंगाली टोला और पांडेय घाट की गलियों में हाथों के हुनर को निखारती हैं। आईया बताती हैं कि जापानी बाजार में बनारस का हैंडीक्राफ्ट खूब बिकता है।
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 हैंडलूम साड़ियां, खादी की कियोनो (फुल बांह की कुर्ती), बनारसी सिल्क, मोतियों की माला, लकड़ी के खिलौने पसंद किए जाते हैं। साइतामा शहर की केंजी यामागुची भी बनारस के बाजार से जुड़ी हैं।
वह यहां के लकड़ी के खिलौनों के अलावा करघे पर तैयार होने वाली तनछुई स्टॉल और बनारसी साड़ियों की साइतामा शहर में आपूर्ति कर रही हैं।
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