काशी की पहचान बचाने के लिए गुरुवार शाम दो दर्जन से अधिक जन संगठनों ने महामना की तपोभूमि बीएचयू के सिंहद्वार से असि नदी की मुक्ति का बिगुल फूंक दिया। पृथ्वी दिवस की पूर्व संध्या पर जन आंदोलन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम संबोधित हस्ताक्षर अभियान से हुई। इस दौरान पांच सौ से अधिक लोगों के हस्ताक्षरयुक्त बैनरों के साथ पैदल चेतना यात्रा निकाली गई। महामना की प्रतिमा के समक्ष असि-गंगा संगम को खोलने, नदी को नालों-कचरे से मुक्त कराने, पाटे गए चैनलों को बहाल करने और दोनों तटों पर हरित पट्टी का विकास करते हुए धरोहर के रूप में संरक्षित करने की आवाज बुलंद की गई।
27 अप्रैल को इसी मुद्दे पर संकटमोचन मंदिर के पास असि नदी के तट पर सत्याग्रह किया जाएगा। बीएचयू के सिंहद्वार पर शाम पौने चार बजे साझा संस्कृति मंच और असि नदी मुक्ति अभियान के बैनर तले दो दर्जन से अधिक संगठनों के लोगों ने हस्ताक्षर अभियान शुुरू किया। सिंहद्वार के सामने एक बड़े फ्लैक्स पर असि नदी की मुक्ति के लिए हस्ताक्षर करने वालों की भीड़ लग गई। असि को बचाना है काशी को स्वच्छ बनाना है...। असि नदी को आचमन लायक बनाएं...। असि नहीं तो वाराणसी नहीं...। अतिक्रमण हटाओ, असि की धारा बचाओ... जैसे विचारों के साथ पांच सौ से अधिक छात्र-छात्राओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। इसके बाद गले में असि मुक्ति के स्लोगन लिखी तख्तियां लटकाए लोग हस्ताक्षर युक्त बैनर, झंडे के साथ नारेबाजी करते हुए निकले। असि को आजाद करो, असि नदी को वापस लेकर रहेंगे...। नगर निगम के राजस्व रिकार्ड में असि को नदी के रूप में पूर्ववत दर्ज किया जाए...। आवाज दो हम एक हैं.... जैसे नारे लगाते हुए पैदल मार्च निकाला गया। लंका चौराहे से संत रविदास गेट होते हुए प्रदर्शनकारी मालवीय प्रतिमा के पास पहुंचे। वहां पदयात्रा संकल्प सभा में तब्दील हो गई। साझा संस्कृति मंच के डॉ. आत्म प्रकाश तिवारी, वल्लभाचार्य पांडेय ने कहा कि कंदवा गांव से निकलकर असि काशी के दक्षिणी छोर असि घाट पर गंगा में मिलती है। इसे असि-गंगा संगम तीर्थ के नाम से जानते हैं लेकिन संगम को पाट दिया गया है। इससे असि नदी अपना वजूद खो चुकी है। नदी के पुनरुद्धार के लिए हर स्तर पर संघर्ष किया जाएगा।