संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में दुर्लभ पांडुलिपियों और ग्रंथों के मुद्रण एवं प्रकाशन में फर्जीवाड़े की फाइल पांच साल बाद खुलेगी। वित्तीय वर्ष 2001 से 2010 तक की अवधि में करीब 10 करोड़ धनराशि का भुगतान बिना काम के ही हो गया था। आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओ डब्ल्यू) से शिकायत के बाद मामले में 2014 में चेतगंज थाने में मुकदमा भी दर्ज हो चुका है। उधर, एडीएम सिटी का पत्र मिलने के बाद विवि ने जांच के लिए नोडल आफिसर नियुक्त कर दिया है।
विश्वविद्यालय के प्रकाशन संस्थान में वित्तीय वर्ष 2001 से 2010 तक दुर्लभ पांडुलिपियों एवं ग्रंथों के मुद्रण और प्रकाशन के लिए शासन ने विशेष अनुदान स्वीकृत किया था। बिना काम किए ही करीब दस करोड़ का फर्जी तरीके से भुगतान करा लिया गया था। वर्ष 2012 में ही किसी ने इसकी शिकायत शासन स्तर पर गोपनीय विभाग में कर दी, प्राथमिक जांच के बाद चेतगंज थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया।
विश्वविद्यालय में 18 जनवरी को इस मामले में जांच के लिए कुलसचिव को संबोधित एडीएम सिटी का पत्र आने के बाद तरह-तरह की चर्चाएं हो रही है। इसमें उन्होंने ईओ डब्ल्यू के पुलिस अधीक्षक के एक जनवरी के उस पत्र का हवाला दिया है जिसमें उन्होंने जांच में सहयोग के लिए विश्वविद्यालय से नोडल अधिकारी नामित करने की मांग की है। उधर, मंगलवार को कुलसचिव ने कुलपति से नोडल आफिसर नियुक्त करने की सिफारिश की जिसके बाद प्रकाशन संस्थानके निदेशक डॉ. पदमाकर मिश्र को नोडल आफिसर नियुक्त कर दिया गया है।