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गो-सेवा से ही कलियुग के चरम प्रभाव को कर सकते हैं कम: बालव्यास

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भागवत श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष वाङ्गमय मूर्ति - बालव्यास - फोटो : Archive
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बालव्यास पं. श्रीकांत शर्मा ने कहा कि श्रीमद्भागवत सिर्फ एक कागज का ग्रंथ नहीं बल्कि यह तो श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष वांग्मय है। द्वापर में जब श्रीकृष्ण अपना दैहिक शरीर का त्याग कर रहे थे तो उद्धव की शंका का समाधान करते हुए श्रीकृष्ण ने कहा कि ये श्रीमद्भागवत में मैं अपना तेज समाहित कर रहा हूं। यही भागवत कलिकाल में मनुष्य को ईश्वर से मिलाने का साधन बनेगा। श्रीकाशी सत्संग सेवा समिति की ओर से महमूरगंज स्थित शुभम लॉन में चल रही सप्ताहव्यापी श्रीमद्भागवत कथा में उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने उद्धव से यह भी कहा है कि जो सुख, आनंद गोपियों को रास लीला के समय आया, वही परमानंद कलिकाल में मनुष्य को भागवत के श्रवण से आएगा। यह जीव और परमात्मा का मिलन कराने की कथा है।
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उन्होंने कहा कि जिसने चित्त से होकर भगवान के इस रस का पान नहीं किया उसका जीवन पशुवत हो गया। यह भगवत भक्ति का सबसे बड़ा कारक है। कलियुग में भागवत की महिमा का वर्णन करते हुए बालव्यास ने कहा कि इस काल में सज्जनों, नेताओं और विद्वानों को चार वस्तुओं से शराब (मदिरा), जुआ, कुमार्ग और हिंसा से सदैव बचना चाहिए। गलत मार्ग से धन कमाने से भी बचना चाहिए। यह कलियुग का ही दुष्प्रभाव है कि आज गो-माता समाप्त हो रही है। भागवत में स्पष्ट लिखा है कि जब इस धरा पर गाय और बैल समाप्त हो जाएंगे तो कलियुग का प्रभाव चरम पर पहुंच जाएगा। यदि इसका प्रभाव कम करना है तो गो-सेवा और गो-रक्षा करनी ही होगी। यजमान ओपी तुलस्यान, बैजनाथ भालोटिया, शुभम अग्रवाल, श्रवण अग्रवाल, किशन भालोटिया, उर्मिला सिंह, भरत संथोलिया ने सपरिवार व्यासपीठ का पूजन कर आरती उतारी। संचालन कृष्ण कुमार काबरा ने किया। इस मौके अवधेश खेमका, सुरेश तुलस्यान, महेश चौधरी, गोपाल अग्रवाल, आनंद स्वरूप अग्रवाल आदि शामिल रहे।
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