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स्वर्वेद महामंदिर: 25 हजार कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ का हुआ समापन, देश-विदेश के भक्तों ने लिया हिस्सा

Tue, 19 Dec 2023 06:15 PM IST
प्रगति चंद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

महायज्ञ के समापन अवसर पर देश- विदेश से आए लाखों भक्तों को संबोधित करते हुए सद्गुरु आचार्य स्वतंत्र देव महाराज ने कहा कि आत्मोद्धार का सर्वश्रेष्ठ साधन है भक्ति। लेकिन आज की भक्ति अज्ञान एवं आडंबरयुक्त जड़भक्ति है।
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स्वर्वेद महामंदिर धाम में महायज्ञ का समापन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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स्वर्वेद महामंदिर धाम उमरहां के प्रांगण में विहंगम योग संत समाज के 100वें वार्षिकोत्सव पर आयोजित 25 हजार कुंडीय स्वर्वेद ज्ञान महायज्ञ का समापन मंगलवार को हुआ। इस महायज्ञ में देश-विदेश से आए लाखों भक्त-शिष्यों ने यज्ञ-कुण्ड में आहुतियां दीं। 

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महायज्ञ के समापन अवसर पर देश- विदेश से आए लाखों भक्तों को संबोधित करते हुए सद्गुरु आचार्य स्वतंत्र देव महाराज ने कहा कि आत्मोद्धार का सर्वश्रेष्ठ साधन है भक्ति, लेकिन आज की भक्ति अज्ञान एवं आडंबरयुक्त जड़भक्ति है। जड़भक्ति से ऊपर उठकर भक्ति के चेतन पथ पर अग्रसर होने की आवश्यकता है। अधिकांश व्यक्तियों का जीवन अविद्या एवं अंधकार में व्यतीत हो रहा है। विहंगम योग ही विशुद्ध चेतन भक्ति है, जिसमें साधक संपूर्ण विकारों को त्यागकर आतंरिक शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है। 

उन्होंने कहा कि जैसे कमल का पत्ता जल से ही उत्पन्न होता है और जल में ही रहता है पर वह जल से लिप्त नहीं होता। ऐसे ही एक विहंगम योगी संसार में रहते हुए संसार के कार्यों को करते हुए भी इससे निर्लिप्त रहता है। 

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स्वर्वेद महामंदिर धाम में महायज्ञ का समापन। - फोटो : अमर उजाला
समारोह के समापन पर भक्तों को संदेश देते हुए संत प्रवर विज्ञानदेव महाराज ने कहा कि हमारा अज्ञान ही हमारे दुखों का कारण है। कोई व्यक्ति अयोग्य नहीं। अच्छाइयां- बुराइयां सबके भीतर हैं। हमें दुर्बलताओं, कठिनाइयों से घबराना नहीं है। उन कठिनाइयों को दूर करने की जो प्रेरणा, जो शक्ति, जो सामर्थ्य है वह अध्यात्म के आलोक से, स्वर्वेद के स्वर से एक साधक को अवश्य ही प्राप्त होता है। क्योंकि हमारे भीतर अंतरात्मा रूप से परमात्मा ही तो स्थित है। 

संत प्रवर ने बताया कि विहंगम योग का ध्यान आंतरिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। एक साधक जब सिद्धासन में बैठकर अपनी चेतना को गुरु उपदिष्ट भूमि पर केंद्रित करता है तो वह मानसिक व आत्मिक शांति का अनुभव करता है। मन पर नियंत्रण न होने से ही समाज में तमाम विसंगतियां फैली हैं। ध्यान में मानव मानवीय गुणों से मंडित होकर दिव्यगुण स्वाभाव वाला बन जाता है।

वार्षिकोत्सव में आए लाखों भक्त शिष्यों ने सद्गुरु देव एवं संत प्रवर के समक्ष अपने दोनों हाथ उठाकर विधिवत सेवा, सत्संग, साधना करने का संकल्प लिया, साथ ही विहंगम योग के प्रमुख सद्ग्रन्थ स्वर्वेद को जन-जन तक पंहुचाने का संकल्प लिया। 

कार्यक्रम का समापन वंदना, आरती एवं शांति पाठ के द्वारा किया गया। समापन के पश्चात् सद्गुरु आचार्य श्री स्वतंत्रदेव जी एवं संत प्रवर  श्री विज्ञान देव जी के दर्शन के लिए अनुयायियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। तीन दिनों तक बहती रही स्वर्वेद की अमृत ज्ञान गंगा। सभी भक्त दर्शन लाभ प्राप्त कर अपने गंतव्य स्थान को चलते रहे। 

इस आयोजन में प्रतिदिन निःशुल्क योगए आयुर्वेद, पंचगव्य, होम्योपैथ आदि चिकित्सा पद्धतियों द्वारा कुशल चिकित्सकों के निर्देशन में रोगियों को चिकित्सा परामर्श के साथ चिकित्सा की भी व्यवस्था की गई थी। 
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पीएम के हाथों स्वर्वेद महामंदिर का लोकार्पण होने के बाद उमड़ा जनसैलाब
     
प्रधानमंत्री द्वारा स्वर्वेद महामंदिर का लोकार्पण 18 दिसंबर सोमवार को किए जाने के बाद मंगलवार की सुबह से ही मंदिर देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। ठंड मौसम के बावजूद भी यहां पहुंचने के लिए दूर- दूर से लोग आते रहे। वहीं सुबह शताब्दी वार्षिकोत्सव समारोह के समापन के बाद आए अनुयायियों ने घर लौटते समय महामंदिर में जाकर वहां महर्षि सदगुरु सदाफलदेव महाराज का दर्शन कर मंदिर में लगाए गए स्वर्वेद के दोहों का उच्चारण कर यहां साधना कर घर लौटते रहे।
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