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स्वामी विवेकानंद को काशी में ही हो गया था मृत्यु का आभास

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स्वामी विवेकानंद का काशी से जन्म और मृत्यु का गहरा नाता था। आत्मवीरेश्वर महादेव के आशीर्वाद से जन्म लेने वाले स्वामी विवेकानंद को काशी में ही अपने मृत्यु का आभास हो गया था। गोपाल लाल विला में प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने कुल सात पत्र लिखे थे। वर्ष 1902 में जब ने बनारस आए तो बीमार थे। यहीं ठहरे व एक माह तक स्वास्थ्य लाभ किया। चार जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए। उन्होंने 39 वर्ष पांच माह, 24 दिन की अल्प आयु में शरीर त्यागा।
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स्वामी विवेकानंद पर अध्ययन कर रहे नित्यानंद राय ने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने काशी के अंतिम प्रवास के दौरान गोपाल लाल विला से सात पत्र लिखे थे। नौ फरवरी 1902 को स्वामी स्वरूपानंद को लिखे पत्र में स्वामीजी ने कहा था कि काशी प्रवास के दौरान मुझे बौद्धधर्म के बारे में बहुत सा ज्ञान प्राप्त हुआ। बौद्धों ने शैवों के तीर्थस्थल को लेने का प्रयास किया लेकिन असफल होने पर उन्हीं के नजदीक नए स्थान बनाए, जैसे बोध गया, सारनाथ आदि। अपने शिष्य चारू को कहते हैं कि वह ब्रह्म सूत्र का स्वयं अध्ययन करे और मूर्खतापूर्ण बातों से प्रभावित ना हो। वह आगे लिखते हैं कि काशी में अच्छा हूं और यदि इसी तरह मेरा स्वास्थ्य सुधरता जाएगा तो मुझे बड़ा लाभ होगा लेकिन अगली ही लाइन में वह कहते हैं कि बौद्ध धर्म और नव हिंदू धर्म के संबंध के विषय में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। इन विचारों को निश्चित रूप देने के लिए कदाचित मैं जीवित ना रहूं, परंतु उसकी कार्यप्रणाली का संकेत छोड़ जाऊंगा और तुम्हें और तुम्हारे भातृगणों को उस पर काम करना होगा।
दूसरा पत्र 10 फरवरी को ओली बुल को लिखा था और इसमें काशी के कलाकारों की प्रशंसा की थी। 12 फरवरी को भगिनी निवेदिता को लिखे गए पत्र में आशीर्वाद देते हुए लिखा था कि यदि श्रीरामकृष्ण सत्य हों तो उन्होंने जिस प्रकार मेरे जीवन में मार्गदर्शन किया है ठीक उसी प्रकार तुम्हें भी मार्ग दिखाकर अग्रसर करते रहें। चौथे पत्र में स्वामी ब्रह्मानंद को 12 फरवरी को लिखते हुए आदेशित किया कि प्रभु के निर्देशानुसार कार्य करते रहना। 18 फरवरी को पांचवां पत्र ब्रह्मानंद को और 21 फरवरी को ब्रह्मानंद को लिखे पत्र में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि कलकत्ते और इलाहाबाद में प्लेग फैल चुका है, काशी में फैलेगा कि नहीं, नहीं जानता...। सातवें और अंतिम पत्र में 24 फरवरी को ब्रह्मानंद को संबोधित करते हुए स्वामी जी ने पत्र का जवाब नहीं लिखने पर नाराजगी जताते हुए लिखते हैं कि एक मामूली सी चिट्ठी लिखने में इतना कष्ट और विलंब। ...तो मैं चैन की सांस लूंगा। पर कौन जानता है उसके मिलने में कितने महीने लगते हैं... और 4 जुलाई 1904 को वे महासमाधि में लीन हो गए।
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बचपन का नाम था नरेंद्र
आरएसएस के राम कुमार गुप्ता ने बताया कि 12 जनवरी, 1863 को उनका जन्म हुआ और मां ने उनका बचपन का नाम वीरेश्वर रखा। बाद में जब स्कूल में गए तो नरेंद्रनाथ नाम रखा गया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आने पर स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए। संकठा मंदिर के पीछे स्थित कात्यायनी मंदिर के गर्भगृह में आत्म वीरेश्वर महादेव विराजमान हैैं जिसकी दीवारों पर स्वामी विवेकानंद के माता-पिता भुवनेश्वरी देवी व विश्वनाथ दत्त की भी तस्वीर लगी हैैं।
प्रथम आगमन 24 वर्ष की आयु में
स्वामी विवेकानंद 24 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1887 में पहली बार काशी आए और गोलघर स्थित दामोदर दास की धर्मशाला में ठहरे। सिंधिया घाट पर गंगा स्नान के दौरान बाबू प्रमदा दास मित्रा से मुलाकात हुई। प्रमदा दास स्वामीजी को अपने घर ले आए। इसके बाद स्वामीजी का काशी आने का सिलसिला जारी हुआ। स्वामी विवेकानंद औरंगाबाद सोनिया रोड पर अपनी शिष्य मां बसुमति के यहां भी ठहरे थे। जिस पलंग पर स्वामी विवेकानंद ने आराम किया था, उसे आज भी सुरक्षित रखा गया है। आज भी इस पलंग की पूजा और आरती की जाती है।
बनारस में ही शिकागो जाने का निर्णय
स्वामी विवेकानंद ने काशी भ्रमण के दौरान ही शिकागो जाने का निर्णय लिया था। उन्होंने वर्ष 1889 में प्रतिज्ञा की थी कि शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि यानी आदर्श की उपलब्धि करूंगा, नहीं तो देह का ही नाश कर दूंगा।
रुको, सामना करो का मिला काशी में संदेश
एक बार काशी प्रवास में स्वामी विवेकानंद दुर्गाकुंड के जंगलों से जा रहे थे। इस बीच बंदर उनका पीछा करने लगे। वे भागे लेकिन रुको, सामना करो के शब्द कान में पड़ते ही ठिठक गए। ऐसा करते ही बंदर भागे। इससे उन्होंने चुनौतियों से भागने के बजाय सामना करना सीखा और दुनिया को इसका संदेश दिया।
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