दुर्गाकुंड मंदिर के पीछे लगा कूड़े का अंबार।
प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान मार्क ट्वेन ने लिखा है कि काशी इतिहास से भी पुरातन और परंपराओं से भी पुरानी नगरी है। यहां कहीं डुबकी लगाने से रोग दूर होते हैं तो कहीं मन का दुख निकल जाता है। कहीं गोता लगाने से जीवन भर के पाप धुल जाते हैं तो कहीं मिल जाती है मुक्ति। ऐसी न्यारी काशी में अपने अलग-अलग महत्व और विशेषताओं को लेकर सनातनधर्मियों की आस्था के केंद्र रहे कुंडों पर संकट की छाया घनी होती जा रही है। पौराणिक महत्व के 62 कुंडों-वापियों और ह्रदों का तो अब पता ही नहीं है। कई कुंडों को पाट कर कॉलोनियां बसा दी गईं तो कहीं सरकारी विभागों के दफ्तर और टावर खड़े हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने 1952 के बाद पाटे गए तालाबों को खुदवाकर नए सिरे से पुनर्जीवित करने का निर्देश तो दिया लेकिन इसके बाद भी अफसरों ने इन कुंडों की सुध नहीं ली। आज हम काशी की एतिहासिक धरोहर दुर्गा कुंड पर डाल रहे हैं रोशनी...।
काशी को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए इन दिनों वोटिंग कराई जा रही है लेकिन इस नगरी की पहचान रहे पौराणिक कुंडों को संवारने के बजाय मिटाया जा रहा है। मान्यताओं और विशेषताओं वाले इन कुंडों के नाम पर कहीं मोहल्ले बसे हैं तो कहीं यादगार मेले लगते हैं लेकिन अब उनकी पहचान का संकट खड़ा होता जा रहा है। विरासत के रूप में जिन पौराणिक महत्व के कुंडों को सहेजा जाना चाहिए, उनमें कूड़ा-कचरा और घरों का गंदा पानी बहाया जा रहा है। शहर के बीच सुरक्षित बचे दुर्गा कुंड की तसवीर भी अब धुंधली होने लगी है। कुंड में सड़न पैदा होने से मछलियां मर रही हैं और दुर्गंध से राह चलना दुश्वार हो गया है लेकिन तमाम शिकायतों के बाद भी जिम्मेदार अफसरों ने इसकी सुध नहीं ली है।
पुराणों में दुर्गा कुंड काशी का वह सिद्ध स्थल है, जहां शुंभ-निशुंभ का वध करने के बाद मां दुर्गा ने विश्राम किया था लेकिन अब वहां आसपास खड़ा होना मुश्किल हो गया है। कुंड के दक्षिणी तट पर मोहल्ले के साथ ही मंदिर का कूड़ा, फूलमाला फेंका जा रहा है। दुर्गा कुंड के महंत कौशल पति द्विवेदी कुंड की बदहाली को लेकर आहत हैं। कहते हैं कि कुंड का कनेक्शन कभी सीधे गंगा से जुड़ा था। तब बारिश का पानी इस कुंड से होकर गंगा में चला जाता था और शहर दक्षिणी में जलभराव नहीं होता था लेकिन अब सड़कों की मनमानी खुदाई और भवनों के निर्माण की वजह से कुंड का वह कनेक्शन बंद हो गया है। इतना ही नहीं, दुर्गा कुंड का पानी भी वर्षों से नहीं बदला गया है। इससे उसमें सड़न पैदा हो गई है। कभी इसमें फव्वारा चलता था, अब कूड़ा-कचरा फेंका जा रहा हैं। मंदिर प्रबंधन ने कुंड से उठने वाली दुर्गंध और अन्य कारणों से उसका दरवाजा बंद करा दिया है।