प्रमुख सियासी दलों के शीर्ष नेतृत्व के बदले मिजाज ने इस बार के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं को सकते में डाल दिया है। आमजन के बीच पैठ रखने वाले राजनीतिक दलों से दूर होने की कसक बाहुबलियों के हावभाव से साफ दिखाई दे रही है। हालांकि वे अपने समर्थकों के बीच यह विश्वास जगाए हुए हैं कि विधानसभा चुनाव में उन्हें हर हाल में जीत मिलेगी। साथ ही, यह दावा भी कर रहे हैं कि वे अपने आसपास की सीटों के चुनाव परिणाम को प्रभावित करने में कामयाब जरूर रहेंगे।
विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं से दूरी बनाने की शुरुआत सबसे पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की। अखिलेश के मन-मिजाज को भांप कर अतीक अहमद ने खुद ही कह दिया कि उनके लिए चुनाव लड़ना जरूरी नहीं है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने भदोही के चर्चित विधायक विजय मिश्रा का टिकट काटा तो बाहुबलियों की बेचैनी और बढ़ गई।
सपा के साथ मिलकर चुनाव में उतरने का एलान कर चुके कौमी एकता दल के वर्तमान विधायक मुख्तार अंसारी कहां से चुनाव लड़ेेंगे, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। जबकि, मुख्तार अंसारी की मौजूदा सीट मऊ सदर से सपा अपना प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। इसी तरह बसपा अरसा पहले ही जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह से किनारा कर चुकी है तो भाजपा ने आजमगढ़ के रमाकांत यादव की टिकट संबंधी मांगों को कोई खास तवज्जो नहीं दी। प्रमुख सियासी दलों के इस बदले रुख से हैरान बाहुबली अब अपने लिए नई राजनीतिक जमीन की तलाश में हैं।
जरायम की दुनिया में कभी खासी दखल रखने वाला मुन्ना बजरंगी इस बार सियासी गलियारों की चर्चाओं से दूर है। बताया जाता है कि मुन्ना की पत्नी विधानसभा चुनाव लड़ेगी लेकिन कहां से यह तय नहीं है। वहीं, बीते साल एमएलसी चुने गए बृजेश सिंह की पत्नी पूर्व एमएलसी अन्नपूर्णा सिंह के वाराणसी या चंदौली जिले की विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि अभी इस बारे में बृजेश खेमे की ओर से कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है।