बीएचयू में हिंदी कवियों के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की थीम पर संगोष्ठी
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माई सिटी रिपोर्टर वाराणसी। बीएचयू में हिंदी राष्ट्रवादी कवियों और उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की थीम पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत हुई। शताब्दी कृषि प्रेक्षागृह में एमपी लोक सेवा, इंदौर के अध्यक्ष प्रो. राजेश लाल मेहरा ने कहा कि भारत जिनका गुलाम रहा उन्होंने यहां की संस्कृति, मूल्यों, आचार और परंपराओं को नष्ट किया। आज भी ऐसे नेरेटिव रचे जा रहे हैं जिनसे भारतीय संस्कृति को लांछित किया जाता है। हमें ऐसी घटनाओं के प्रति सजग रहना चाहिए। हमारे त्योहार और सांस्कृतिक प्रतीक भारत को एकसूत्र में पिरोते हैं। संगोष्ठी में हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी की पुस्तक का अनावरण किया गया। कार्यक्रम में बताया गया कि हिंदी की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी कविता की शुरुआत काशी के भारतेंदु हरिश्चंद्र से होती है। उनके बाद इस परंपरा को जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, श्यामनारायण पांडेय, सुभद्रा कुमारी चौहान, श्यामलाल गुप्त ''''ने जारी रखा। साहित्यकार प्रो. रामसुधार सिंह ने कहा कि राष्ट्रवादी कवियों की बहुत सी रचनाएं अभी तक प्रकाशित नहीं हो पाईं हैं, जिन्हें सामने लाना जरूरी है। प्रो. मेहरा ने कहा कि भारत सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में ही पहचाना जाता है। यदि संस्कृति को निकाल दिया जाए तो राष्ट्र अधूरा रह जाता है। आज के साहित्यकार करे वैदिक काल जैसा चिंतन
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हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन के साहित्यकारों ने देश की दुर्दशा का चित्रण और उस दशा से मुक्ति के प्रयासों पर बात किया। आरएसएस के काशी प्रांत प्रचारक रमेश कुमार ने कहा कि वैदिक काल में जो चिंतन होता था, आज के साहित्यकार भी वैसा करें। आईएमएस-बीएचयू के निदेशक प्रो. एस एन संखवार ने कहा कि हमें आचरण को अपने साहित्य से मार्गदर्शन देना चाहिए। कला संकाय प्रमुख प्रो. मायाशंकर पांडेय ने कहा कि संस्कृति का मूल संदेश विश्व बंधुत्व है।
सूर, तुलसी, कबीर ने दिखाया एक राष्ट्र डॉ. प्रमोद श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखने की परंपरा पुरानी है। आदि शंकराचार्य ने भी भारत के सांस्कृतिक एकीकरण का प्रयास किया। जिसका विकास सूर, तुलसी, कबीर के साहित्य में देखा जा सकता है। प्रो. निरंजन सहाय ने राष्ट्रीय आंदोलन में छपने वाली पत्रिकाओं में कविताओं को पढ़ने समझने का सिलसिला शुरू होना चाहिए। प्रो. चंदन कुमार ने कहा कि अगर हिंदू मुसलमान एकता के आईने में ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पढ़ना है तो रसखान को, ताज को पढ़ने की जरूरत है। सांस्कृतिक संध्या में लोक गायिका डॉ. सुचरिता गुप्ता और गजल गायक डॉ. दुर्गेश उपाध्याय ने प्रस्तुतियां दीं।