काशी परंपराओं का शहर है। कंकड़-कंकड़ शंकर की मान्यता वाले वाराणसी शहर में भगवान विश्वनाथ लोक के देवता हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के 356 सालों के इतिहास में पहली बार बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा और रजत पालकी को 12 घंटे तक मंदिर में इंतजार करना पड़ा। मंदिर प्रशासन की मनमानी के कारण महंत परिवार के सदस्य रात भर बाबा के दर पर इंतजार करते रहे। मंदिर प्रशासन की ओर से बाबा की प्रतिमा और पालकी को रोके जाने की घटना पर काशी की जनता में भी आक्रोश है। संत समाज ने भी इसे काशी की परंपराओं पर हमला बताया है और मंदिर प्रशासन को मान्यताओं के साथ खिलवाड़ न करने की नसीहत दी है।
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि काशी परंपराओं का शहर है और जो पारंपरिक मान्यताएं हैं, उनसे किसी भी तरह का खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। काशी विश्वनाथ काशीवासियों के देवता हैं। काशी और शिव अलग नहीं हैं। मंदिर प्रशासन को तो परंपराओं के निर्वहन करने वालों को प्रश्रय देना चाहिए, जो लोक मान्यताओं से चला आ रहा है।
उसको सहेज कर रखना चाहिए। जब काशी में परंपराएं ही समाप्त हो जाएंगी तो शेष क्या बचेगा। माता अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी महाराज का कहना है कि परंपरा के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ उचित नहीं है। मंदिर प्रशासन को काशी विश्वनाथ की परंपराओं का ध्यान रखना चाहिए।
भगवान शिव-पार्वती की चल प्रतिमा और रजत सिंहासन दोबारा महंत आवास तक लाने के लिए मंदिर के महंत परिवार के सदस्यों को सारी रात मंदिर के अंदर और बाहर धरना देना पड़ा। 12 घंटे की खींचतान और जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद बाबा की चल प्रतिमा महंत आवास पर पहुंची। महंत परिवार ने विधि-विधान से गौने के बाद की रस्मों का निर्वाह किया। रंगभरी एकादशी पर महंत आवास से रजत पालकी पर सवार बाबा गौने की बारात लेकर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे थे।
मंदिर प्रशासन की नासमझी थी और सूचना मिलने के बाद प्रतिमा व रजत पालकी को वापस भिजवा दिया गया है। मंदिर प्रशासन ने बताया कि नीचे के कर्मचारियों की वजह से यह विवाद हुआ। इस मामले में मंदिर प्रशासन को जांच का निर्देश दिया गया है।कौशल राज शर्मा, जिलाधिकारी