सम्मेलन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रो. विजेंद्र शर्मा व प्रो. भारत भूषण मिश्र, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी, नीम का थाना राजस्थान से कौशल दत्त शर्मा, बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर प्रो. चंद्रमौलि उपाध्याय व प्रो. कमलाकर त्रिपाठी, तिरुपति से प्रो. कृष्ण कुमार भार्गव, रूस की प्रमुख ज्योतिषाचार्य से डॉ. इरिना, हापुड़ से प्रो. वासुदेव शर्मा, उज्जैन से डॉ. उपेंद्र भार्गव, भोपाल से डॉ. गणेश त्रिपाठी, सोमनाथ मंदिर के डॉ. नित्यानंद ओझा समेत 200 से ज्यादा ज्योतिषाचार्य हिस्सा ले रहे हैं।
प्रो. पांडेय ने कहा कि सनातन की सभी व्यवस्था पंचांग पर आधारित है। प्राचीन काल में इसमें कोई विभिन्नता नहीं थी। लेकिन, वर्तमान दौर और सिद्धांत भेद के चलते ग्रहों के गणितीय मान और उससे बनने वाली तिथियों और दिनों में भी अंतर दिखने लगा। इस वजह से व्रत और त्योहारों की तिथियों के निर्णय पर असर पड़ रहा है। इससे समाज में भ्रम की स्थिति बन रही थी। ऐसे में देशभर के ज्योतिषाचार्यों और पंचांगकारों की जिम्मेदारी हो जाती है कि इस स्थिति से निपटा जाए।
प्रो. पांडेय ने बताया कि सम्मेलन के अंतिम दिन हम इस पर भी मंथन करेंगे कि बीते कुछ साल में पंचांगों की एकरूपता को लेकर उठाए गए कदम पर कितना काम हुआ। पंचांग निर्माण की व्यवस्था सबीज होगी या निर्बीज इस पर मंथन होगा। सबीज का अर्थ है कि बाहर से डेटा कलेक्ट कर पंचांग बना लिया गया हो और किसी पारंपरिक ग्रंथ को नहीं पढ़ा गया हो। वहीं, निर्बीज में सूर्य सिद्धांत और शास्त्रों के अध्ययन के तहत पंचांग तय होते हैं।
मुहूर्त की तरह कुंडली से गुण-दोषों को भी मिलाना बहुत जरूरी है। जबकि कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें लगता है मेलापक यानी कि कुंडली आधारित विवाह से बहुत विलंब हो जाता है। जबकि विवाह मेलापक दांपत्य जीवन की समग्रता और अनुकूलता का एक आधार स्तंभ होता है। ऐसे में सामाजिक और शास्त्रीय विषयों में समन्वय कैसे किया जाए, इसका जवाब ढूंढा जाएगा।