काशी की आर्थिक रीढ़ पर्यटन का बेड़ा अब ‘मां गंगा’ पार लगाएंगी। उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग 2016-17 व 2017-18 के लिए गंगा और घाट को केंद्र में रखकर कई योजनाएं बनाई हैं। दो मलयेशियन क्रूज चलाने की योजना की डीपीआर बन गई है तो अस्सी पर गंगा के पानी के पर्दे पर लेजर शो की योजना भी मूर्त रूप ले रही है। आध्यात्मिक पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वूपर्ण वाराणसी के प्रमुख धार्मिक स्थलों का मुखड़ा चमकाने और पर्यटकों व श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का काम भी तेजी से हो रहा है। 2018 तक ये काम पूरे होने पर काशी के पर्यटन व्यवसाय को पंख लग जाएंगे।
वाराणसी की पूरी अर्थव्यवस्था आध्यात्मिक पर्यटन पर टिकी है, जिसका आधार मां गंगा, घाट, काशी विश्वनाथ ही नही बल्कि सारनाथ स्थित बौद्ध स्थल, जैन मंदिर, रविदास मंदिर और कबीर मठ है। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं और दिन में दर्शन-पूजन, शाम को गंगा आरती के बाद दूसरे दिन दोपहर बाद तक सारनाथ घूम कर लौट जाते हैं। रुकने के विकल्पों की कमी के कारण पर्यटक यहां डेढ़ दिन से ज्यादा नहीं रुकता है। इस कारण अब उत्तर प्रदेश पर्यटन ने ‘मां गंगा’ की शरण ले ली है। उनकी ज्यादातर योजनाओं के मूल में मां गंगा ही हैं। इसके बाद वाराणसी आने वाले पर्यटक दो से तीन दिन यहां गुजारेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘काशी ब्रांडिंग’ का पर्यटन पर जबरदस्त असर पड़ा है। कभी जापानी प्रधानमंत्री तो कई किसी मेहमान के साथ वह गंगा व घाटों पर आते रहे हैं। इससे विदेशों में भी काशी की पहचान मजबूत हुई है। आंकड़ों के आइने में देखें तो 2015 में 54 लाख 13 हजार 927 देशी तथा 3 लाख दो हजार 370 विदेशी सैलानी काशी आए। इससे पहले 2014 में यह आंकड़ा 52 लाख के लगभग देशी व पौने तीन के लगभग विदेशी सैलानी तक सिमटा था।