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प्राचीन काल की परंपरा टूटेगी, नहीं मिलेगा मां लक्ष्मी का दर्शन

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काशी के लक्खा मेले में शुमार सोरहिया मेले की परंपरा इस बार टूट जाएगी। कोरोना संक्रमण की काली छाया के कारण भक्तों को न तो माता लक्ष्मी का दर्शन मिलेगा और ना ही लक्ष्मीकुंड पर मेला सजेगा। कोरोना संक्रमण को देखते हुए प्रशासन ने सार्वजनिक आयोजनों पर रोक लगा रखी है। इससे महिला श्रद्धालुओं में निराशा है।
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काशी में 25 अगस्त से सोरहिया मेला शुरू होगा। लक्ष्मीकुंड पर स्थित महालक्ष्मी मंदिर में 16 दिनों तक पूजा पाठ के लिए भीड़ उमड़ती है लेकिन इस बार लक्ष्मीकुंड पर सन्नाटा रहेगा। सुख, समृद्धि और संतान प्राप्ति के लिए रखे जाने वाले इस व्रत के साथ लाखों लोगों की श्रद्धा जुड़ी हुई है। इसकी गिनती भी काशी के आठ लक्खा मेलों में होती है। यहां इस मेले में 16 अंक का विशेष महत्व है। कोरोना संक्रमण के कारण मंदिर में दर्शन-पूजन पर प्रतिबंध लग जाने के कारण श्रद्धालुओं में निराशा है।
काली मंदिर के महंत विकास दुबे ने बताया कि प्राचीन काल से सोरहिया पूजन होता है। व्रत और पूजन ऐसा पहली बार हो रहा है जब लक्ष्मीकुंड पर सोरहिया का मेला नहीं लगेगा। कोरोना संक्रमण के कारण प्रशासन ने यह निर्णय लिया है। कन्हैया दुबे केडी ने बताया कि सोरहिया मेला से काशी की जनता की आस्था जुड़ी हुई है। मेला और दर्शन पर रोक लगने से श्रद्धालुओं में निराशा है।
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महालक्ष्मी के पूजन और व्रत का नाम सोरहिया पड़ा क्योंकि यहां 16 अंक का विशेष महत्व है। 16 दिन के व्रत और पूजन में स्नान और 16 आचमन के बाद देवी विग्रह की 16 परिक्रमा की जाती है। माता को 16 चावल के दाने, 16 दूर्वा और 16 पल्लव अर्पित किए जाते हैं। व्रत के लिए 16 गांठ का धागा धारण किया जाता है। जो कथा सुनी जाती है इसमें 16 शब्द होते हैं। 16वें दिन जीवितपुत्रिका या ज्यूतिया के निर्जला व्रत के साथ पूजन का समापन होता है।
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