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राम सीय सिर सेंदुर देहीं सोभा कहि न जाति बिधि केहीं

Wed, 21 Sep 2016 02:08 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
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रामनगर की रामलीला में जानकी और राम का विवाह।
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प्रमुदित मुनिन्ह भावंरी फेरीं/नेग सहित सब रीति निबेरीं/राम सीय सिर सेंदुर देहीं/सोभा कहि न जाति बिधि केहीं/जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी/सकल कुअंर ब्याहे तहिं करनी/कहि न जाइ कछु दाइज भूरी/ रहा कनक मनि मंडपु पूरी...। मंगलवार की शाम पांच बजे रामनगर किले से हाथी पर सवार होकर काशिराज अनंत नारायण सिंह निकले और डंका बजने लगा। हाथियों का बेड़ा अयोध्या पहुंचते ही पं. लक्ष्मी नारायण व्यास ने परंपरागत उद्घोष किया- चुप रहो... सावधान...।
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रामायणी पाठ करने लगे और राजा दशरथ के दरबार में जनकी पाती पढ़ने का प्रसंग शुरू हो गया। पीढ़े पर बैठक ताड़पत्रों के बेने झलते लीला प्रेमियों से मैदान खचाखच भर गया था। दशरथ के हाथ में चिट्ठी देख भरत, शत्रुघ्न दौड़कर पहुंच गए। खबर दी गई कि सीता स्वयंवर में राम ने शिव के पिनाक को उसी तरह तोड़ डाला जैसे हाथी कमलिनी को तोड़ डालता है। मंगलगीत गाए जाने लगे। जनकपुर के लिए बारात सजने लगी। 

संवाद खत्म होने के बाद लीला के पात्र उठे और राजा के हाथी भी मुड़ गए। अयोध्या मैदान के ठीक सामने मशालची राधेश्याम, विशाल मशाल जलाए खड़े थे और शहनाई पर पायो जी मैंने राम रतन धन पायो... की धुन पर दुक्कड़ बज रहा था। पालकियों में रानियां सवार हो गईं। कागज के घोड़ों से बंधे रथ पर दशरथ और वशिष्ठ बैठ गए। फिर बारात निकली। दशरथ के पीछे हाथी पर राजा अनंत नारायण सिंह चल रहे थे। बाजे गाजे के साथ बारात पीएन कॉलेज के पास पहुंची तो सड़क पर ही कुछ देर के लिए पड़ाव डाल दिया गया।
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इसके बाद यहां से बारात उठकर पुरानी जजी परिसर में पहुंची। इसके बाद काशिराज ने संध्या की। वहीं विश्वामित्र के साथ कुछ देर बाद राम-लक्ष्मण भी पहुंचे। चारों दूल्हों को सजाया गया। फिर बारात जनकपुर के लिए निकली। सड़क पर देवताओं ने इस मंगलदायक घड़ी को लेकर संवाद किया। बारात के पीछे लीला प्रेमियों का कारवां चल रहा था। मेले के रंग छा गए थे। जनकपुर में गाड़े गए मड़वा के चारों तरफ महिलाओं, युवतियों की भीड़ थी। यहां रीति-रिवाज से मेहताबी रोशनी के बीच राम के साथ सीता, लक्ष्मण के साथ उर्मिला, भरत के साथ मांडवी और शत्रुघ्न के साथ श्रुतिकीर्ति का विवाह हुआ। 
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