दुनिया के प्राचीनतम शहर वाराणसी की पहचान से जुड़ी मोक्षदायिनी असि नदी के उद्धार की अखिलेश सरकार की योजना को नए भगीरथ प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि असि के कायाकल्प की योजना को मूर्त रूप देना आसान नहीं। इसकी राह में रोड़े बहुत हैं। जिस नदी में कभी पापमोचनी पावन धारा बहती थी, उसमें वर्षों से कारखानों, घरों की गंदगी बहाई जा रही है। नदी की तलहटी को कहीं पाट कर कब्जा कर लिया गया तो कहीं वीडीए ने नीलाम कर दिया है। असि-गंगा संगम के मोक्ष तट तक को पाटकर घाट, सीढ़ियां बना दी गई हैं। धारा मोड़कर नदी के गौरवशाली इतिहास को नगवा नाले के रूप में कलंकित कर दिया गया है। नदी विशेषज्ञों और जल संरक्षण पर काम करने वाले संगठनों का कहना है कि ऐसे में असि रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट निश्चित रूप से एक बड़ी पहल है लेकिन इसे साकार करने के लिए नदी की मूल समस्याओं को दूर करना होगा।
असि के कायाकल्प से तटवर्ती बस्तियों में रहने वाले करीब पांच लाख लोगों को नरकतुल्य जिंदगी से मुक्ति मिलेगी। हरितपट्टी के विकास से तलहटी का पर्यावरण सुधरेगा। असि कॉरीडोर में पर्यटन भी बढ़ने की उम्मीद है। असि नदी मुक्ति अभियान से जुड़े कपींद्र तिवारी बताते हैं कि असि नदी के उद्धार से शहर दक्षिणी को विकास की नई दिशा मिल सकती है। कई जगह बंद नदी के रास्ते को खोलकर अतिक्रमण मुक्त किया जाना चाहिए। नदी क्षेत्र की कॉलोनियों के अलावा डीरेका, बीएचयू और शहर के नालों को असि में बहने से रोकने की योजना बननी चाहिए। असि नदी पर लंबे समय तक काम करने वाले पर्यावरणविद प्रो. यूके चौधरी का कहना है कि असि के उद्धार के बिना वाराणसी का उद्धार नहीं हो सकता। इस नदी के पुनर्जीवन के लिए इसकी समस्याओं को चिह्नित कर दूर किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि ज्यादा नुकसान भी न हो और नदी पुनर्जीवित हो जाए।