सीरगोवर्धन में धूमधाम से मनी रविदास जयंती
जाति-जाति में जाति है जो केतन के पात/ रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात। हिंदू -तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रकत और मासा/दोऊ एकउ दूजा नाहीं पेख्यो सोइ रैदासा..। कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव जब लगि एक न पेखा/वेद कतेब कुरान पुरानन सहज एक नहिं देखा...। संत रविदास ने जाति-पात, धर्म-मजहब के भेद से रहित बिना किसी दुख के शांति और इंसानियत के जिस बेगमपुरा शहर की परिकल्पना की थी, उसका स्वरूप शुक्रवार को उनके जन्मस्थान सीर गोवर्धन में जयंती समारोह में दिखा। जात-पात के भेद मिटाकर गुरु रविदास के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए मगन होकर लोग निकले।
गांव-गांव से झांकियां निकलीं। संत रविदास के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए उमड़े सैलाब ने सीर गोवर्धन गांव में कुंभ का रूप ले लिया। कहीं अटूट लंगर की पांत लगी रही तो कहीं भजनों की टोलियों के झांझ, मजीरे बजते रहे। लाल, नीली, पीली पगड़ी में पंजाब भी था और घाघरा में राजस्थानी झलक भी। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश से लेकर कर्नाटक, महाराष्ट्र, जम्मू, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार की संस्कृतियों का मिलन शिविरों में एक साथ हो रहा था। सड़कों की पटरियों पर खिलौने भी सजाए गए और खेतों में झूले, चर्खियों पर खुशियों के शोर भी गूंजे।
संत रविदास जयंती के अवसर पर सीर गोवर्धन में लघु भारत जैसा दृश्य नजर आया। यहां उत्तर से लेकर दक्षिण, पूरब, पश्चिम के साथ अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, स्विटजरलैंड, दुबई, आस्ट्रेलिया समेत कई देशों से एनआरआई श्रद्धालुओं ने संत रविदास के दरबार में हाजिरी लगाई। अलग-अलग राज्यों के टेंट लगाए थे। सभी पर सुविधा और सुरक्षा के लिए सेवादारों की तैनाती भी की गई थी। श्रद्धालुआें की स्वास्थ्य जांच आदि के लिए भी शिविर लगाए गए थे। ऐसी भी स्थिति आई जब किसी शिविर में जगह नही रही तो उन्हें दूसरे प्रदेश के शिविरों में जगह दी गई।