श्रावणी उपक्रम की पूजा करते मराठी ब्राह्मण।। स्वयं
वाराणसी। ब्राह्मणों का महापर्व श्रावणी उपाकर्म सावन पूर्णिमा पर मनाया जाएगा। इस दौरान ब्राह्मणजन नदी व सरोवरों में चार घंटे सूर्यदेव की उपासना करेंगे। आठ तरह के द्रव्यों से स्नान के बाद पितरों और सप्तऋषियों का तर्पण करेंगे। नए जनेऊ धारण करने के साथ ही करीब 10 तरह के द्रव्यों से पूजन किया जाएगा। विभिन्न घाटों पर सुबह से छह से आठ घंटे तक श्रावणी उपाकर्म की पूजा होगी।
श्रावणी उपाकर्म सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह पर्व जनेऊधारी ब्राह्मणों के लिए अत्यंत पावन माना गया है। इस दिन ब्राह्मण पुरानी जनेऊ को त्यागकर मंत्रोच्चार के साथ नई जनेऊ धारण करेंगे। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि कुछ पर्व अलग-अलग वर्णों के लिए भी विशेष रूप से निर्धारित किए गए हैं। दीपावली वैश्य समाज, विजयादशमी क्षत्रियों और होली शूद्र वर्ण के लिए है, जबकि श्रावणी उपाकर्म ब्राह्मणों के लिए होता है। इसलिए इस दिन खासकर जनेऊधारी ब्राह्मण इस अनुष्ठान को पूर्ण करते हैं।
उन्होंने बताया कि श्रावणी उपाकर्म की प्रक्रिया बाह्य के साथ आत्मिक शुद्धि का भी प्रतीक है। उपाकर्म का अर्थ ज्ञान, तप और नई शुरुआत से है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, तर्पण और संकल्प होता है। साथ ही ब्राह्मण जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। दशाश्वमेध घाट, ब्रह्माघाट, अस्सी और सिंधिया घाट आदि पर श्रावणी उपाकर्म होगा।
पंचगव्य, कुशा, दुर्वा और चिड़चिड़े से भी स्नान
श्रावणी उपाकर्म के दौरान ब्राह्मणजन गंगा या किसी अन्य नदी में स्नान के बाद सूर्यदेव की पूजा करते हैं। इसके बाद पंचगव्य के पांच द्रव्यों दूध, गोमूत्र, गोबर, दही और घी के अलावा कुशा, दुर्वा व चिड़चिड़े से स्नान करते हैं। वैदिक विधि से पूजन कर पुराने जनेऊ को उतारकर नए जनेऊ का पूजन कर उसे धारण करेंगे।