शास्त्रीय संगीत की दो महान विभूतियों की याद में गुरुवार की शाम तीन दिवसीय संगीत महोत्सव ‘रागगिरी की पेशकश’ का जोरदार आगाज हुआ। ठुमरी, दादरा, कजरी की बंदिशें गूंजीं तो अजराड़ाबाज के तबले की थाप भी श्रोताओं के सिर चढ़कर बोली। यह संगीत निशा शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की जन्मशताब्दी और तबला सम्राट पद्मविभूषण पं. किशन महाराज की जयंती के उपलक्ष्य में चौकाघाट स्थित सांस्कृतिक संकुल में आयोजित की गई।
रात करीब साढ़े सात बजे शुरुआत हुई दुर्गा प्रसाद प्रसन्ना के शहनाई वादन से। इन्होंने शहनाई पर राग बागेश्री की अवतारणा की। इसके बाद दादरा की बंदिश बजाकर संगीत रसिकों का मन मोहा। इसके बाद बनारसी धुन-हमरा राखियो हे विश्वनाथ बाबा... की प्रस्तुति से इन्होंने विराम लिया। शहनाई पर साथ दिया संगम प्रसन्ना ने। तबले पर प्रदीप कुमार, दुक्कड़ पर गोरख भट्ट ने संगत की। इनके बाद अजराड़ा घराने के तबला वादक अकरम खां की बारी आई। इन्होंने तीन ताल में पेशकार से शुरुआत की। इसके बाद कायदा, फर्द, गत, टुकड़ा, तिहाई के बाद अंगुस्ताना का रेला बजाया। अकरम ने तबले की बारीकियों से भी ताल प्रेमियों का ध्यान खींचा।
उन्होंने बताया कि ‘तिरकिट’उनके घराने की उपज नहीं है, लेकिन संगीत रसिकों के आग्रह पर उन्होंने दिल्ली, बनारस घराने के ऐसे कई बोल बजाए। हारमोनियम पर संगत की पं. धर्मनाथ मिश्र ने। इनके बाद उप शास्त्रीय गायिका मालिनी अवस्थी ने मंच संभाला। इंतजार की घड़ियां खत्म होते ही, जैसे ही वह माइक पर आईं, हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगे। इन्होंने राग देस मिश्र में ठुमरी की बंदिश से शुरुआत की। बंदिश के बोल थे- कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए...। इसके बाद -तरसेला जियरा हमराल हो नइहर में... की प्रस्तुति पर मलिनी ने खूब तालियां बटोरी। काहे करेलू गुमान गोरी सावन में... के बाद सेजिया पर लोटै काला नाग हो/कचौड़ी गली सून कइला बलमू... जैसी एक से बढ़कर एक पारंपरिक बंदिशों को सुरों से सजाकर उन्होंने महफिल लूट ली। इससे पहले महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पूर्व वीसी एसएस कुशवाहा ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। वीडीए उपाध्यक्ष पीसी श्रीवास्तव, जिला सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा समेत तमाम लोग उपस्थित थे।