माथे पर चंद्रमा और बाईं ओर जटाओं में डमरू उकेरा गया है। ये तीनों पहचान भगवान शिव के हैं। बुद्ध से इनका कभी भी कोई संबंध नहीं रहा है। एकमुखी शिवलिंग में शिव का चेहरा शांत भाव में दिखाया जाता है। दूसरी ओर बुद्ध की मूर्तियों में चेहरा हमेशा ध्यानमग्न और करुणा से भरा होता है।
बुद्ध को साधु के रूप में दिखाया जाता है, जबकि इस प्रतिमा में कानों में कुंडल हैं। यह किसी संन्यासी का नहीं बल्कि भगवान शिव का रूप है। पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि ऐसे एकमुखी लिंग गुर्जर-प्रतिहार काल में बालू पत्थर से बनाए जाते थे और इनमें शिव की अलंकरणपूर्ण विशेषताएं प्रमुख होती थीं।
बुद्ध की मूर्तियां लिंगाकार नहीं होतीं। वे या तो पद्मासन में बैठी होती हैं या खड़ी मुद्रा में। यहां योनिपीठ वाला शिवलिंग स्पष्ट दिख रहा है जो कि केवल शैव उपासना में इस्तेमाल होता है। अगर यह बुद्ध की मूर्ति होती तो धर्मचक्र, कमल या भिक्षापात्र जैसे बौद्ध प्रतीक मिलते। इनके बजाय आधार पर जल निकास मार्ग बना है जो अभिषेक के लिए उपयोग होता है।
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