शंकराचार्य ने कहा कि पीतल की ''ज्योतिस्वरूप'' कलाकृति ''अग्निमुखं वै देवा:'' है। ज्योति का अर्थ साक्षात् ''तेज'' तत्व (अग्नि) है। पीतल को ज्वाला का आकार दे देने मात्र से वह ज्योति नहीं हो जाती। बिना घी, तेल और वर्तिका के किसी भी जड़ पदार्थ को ''ज्योति'' की संज्ञा देना शब्द-भ्रमोत्पादन और शास्त्रीय मर्यादा का अपमान है, जो आकृति स्वयं के प्रकाश के लिए बाहरी विद्युत (बिजली) पर निर्भर हो, उसे ''अखंड ज्योति'' कहना सनातन धर्म की परिभाषाओं के विरुद्ध है।
उन्होंने पत्र में ट्रस्ट को निर्देशित किया है कि वे वर्तमान मुख्य गर्भगृह और ''ज्योतिस्वरूप'' वाले स्थान के बीच के शास्त्रीय संबंध को तत्काल स्पष्ट करे, ताकि अशास्त्रीय धातु-कलाकृति (मेटल आर्ट) को वहां से हटाकर उसके स्थान पर विधि-विधान से साक्षात ज्योति (घी, तेल का दीपक) की स्थापना की जाए।
शंकराचार्य ने कहा है कि श्रीराम मंदिर जैसे धर्म-प्राण केंद्र पर परंपराओं का आधुनिकीकरण और शास्त्रों की उपेक्षा भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि ट्रस्ट अपनी इस भूल को सुधारते हुए यथाशीघ्र शास्त्रीय मर्यादा की पुनः स्थापना करेगा और मूल स्थान के विषय में भक्तों के बीच उत्पन्न हो रही भ्रांतियां दूर करे।