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UP: शंकराचार्य ने चंपत राय को लिखा पत्र, ज्योतिस्वरूप पर जताई आपत्ति; कहा- परंपरा का हो रहा उल्लंघन

Wed, 15 Apr 2026 07:27 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट को पत्र लिखकर गर्भगृह के स्थान और पीतल की “ज्योतिस्वरूप” कलाकृति पर आपत्ति जताई। इसे शास्त्र-विरुद्ध बताते हुए उन्होंने असली ज्योति (घी-तेल दीप) स्थापित करने और मूल जन्मस्थान की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को पत्र लिखा है। उन्होंने अयोध्या में जन्मभूमि के मूल स्थान की शास्त्रीय स्थिति और वहां स्थापित की गई पीतल की ''ज्योतिस्वरूप'' कलाकृति पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन और परंपराओं के साथ अक्षम्य ब्लंडर बताया।

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शंकराचार्य ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि का प्रत्येक कण वंदनीय है। विशेषकर वह स्थान जहां पूर्व में केंद्रीय गुंबद था और जहां वर्षों तक प्रभु का ''चल विग्रह'' प्रतिष्ठित रहा। वह अपनी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण अत्यंत संवेदनशील है। उन्होंने ट्रस्ट से प्रश्न किया है कि क्या वर्तमान भव्य मंदिर का गर्भगृह उस ''मूल जन्म स्थान'' से अलग बनाया गया है? उन्होंने चेताया कि यदि ऐसा है, तो यह शास्त्र और परंपरा की दृष्टि से एक भारी भूल है, क्योंकि गर्भगृह का स्थान अपरिवर्तनीय होता है।

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कार्रवाई की मांग

शंकराचार्य ने कहा कि पीतल की ''ज्योतिस्वरूप'' कलाकृति ''अग्निमुखं वै देवा:'' है। ज्योति का अर्थ साक्षात् ''तेज'' तत्व (अग्नि) है। पीतल को ज्वाला का आकार दे देने मात्र से वह ज्योति नहीं हो जाती। बिना घी, तेल और वर्तिका के किसी भी जड़ पदार्थ को ''ज्योति'' की संज्ञा देना शब्द-भ्रमोत्पादन और शास्त्रीय मर्यादा का अपमान है, जो आकृति स्वयं के प्रकाश के लिए बाहरी विद्युत (बिजली) पर निर्भर हो, उसे ''अखंड ज्योति'' कहना सनातन धर्म की परिभाषाओं के विरुद्ध है।

उन्होंने पत्र में ट्रस्ट को निर्देशित किया है कि वे वर्तमान मुख्य गर्भगृह और ''ज्योतिस्वरूप'' वाले स्थान के बीच के शास्त्रीय संबंध को तत्काल स्पष्ट करे, ताकि अशास्त्रीय धातु-कलाकृति (मेटल आर्ट) को वहां से हटाकर उसके स्थान पर विधि-विधान से साक्षात ज्योति (घी, तेल का दीपक) की स्थापना की जाए।

शंकराचार्य ने कहा है कि श्रीराम मंदिर जैसे धर्म-प्राण केंद्र पर परंपराओं का आधुनिकीकरण और शास्त्रों की उपेक्षा भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि ट्रस्ट अपनी इस भूल को सुधारते हुए यथाशीघ्र शास्त्रीय मर्यादा की पुनः स्थापना करेगा और मूल स्थान के विषय में भक्तों के बीच उत्पन्न हो रही भ्रांतियां दूर करे।
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