काशी के अमर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। आजादी पाने की ललक इतनी ज्यादा थी कि वरिष्ठ नेताओं के अलावा युवा और किशोर भी आंदोलन में अपनी आहुति देने को तत्पर थे। ऐसे ही क्रांतिकारी सेनानी थे शचींद्रनाथ बख्शी। काकोरी कांड के इस नायक ने अपने अदम्य साहस से वीरता के नए आयाम गढ़े। शचींद्र नाथ बख्शी की किताब क्रांति के पथ पर में क्रांति यात्रा की पूरी कहानी है।
शचींद्र नाथ बख्शी पर राष्ट्रीय आंदोलन का इतना ज्यादा असर था कि इंटर की परीक्षा देने के बाद से ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए। वाराणसी में 1922 में जब अनुशीलन समिति की शाखा खुली तो उन्होंने नए क्रांतिकारियों को भर्ती करने और प्रशिक्षण केंद्रों के प्रबंधन की जिम्मेदारी उठा ली।
लगन, मेहनत और समर्पण का ही परिणाम था कि समिति का विस्तार हुआ और क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो गईं। गुप्तचर विभाग के कान खड़े हो गए और वह पीछे लग गया। शचींद्र को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने बनारस छोड़ दिया और लखनऊ को केंद्र बना लिया। 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की जिम्मेदारी उठाई। बनारस, लखनऊ और झांसी की जिम्मेदारियां निभाते हुए कई युवाओं को क्रांति की इस मशाल से जोड़ा