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अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ से नहीं हुआ सीवर समस्या का समाधान

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केस वन
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शहर में 2016-17 में सीवर पाइप लाइन डालने के लिए 200 करोड़ रुपये खर्च कर 350 ठेकेदारों को पाइप डालने का जिम्मा सौंपा गया। इन ठेकेदारों ने पाइप डाली, लेकिन किसी भी ठेकेदार ने इन पाइपों को आपस में नहीं जोड़ा था। यह अधिकारियों और ठेकेदारों का गठजोड़ ही था जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है। जिसे सुधारने का काम अब तक जारी है।
केस टू
2016-17 से अब तक 25 करोड़ रुपये खर्च हो गए, लेकिन सिगरा-महमूरगंज मार्ग पर सीवर समस्या का आज तक समाधान नहीं हुआ। यहां पर 500 मीटर में पाइप ही नहीं डाली गई। जिसके चलते सीवर रिसकर नीचे खोखला कर रहा था। जब हल्ला मचा तब जाकर पता चला। यह सब कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ से हुआ था।
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जल निगम 1990 से शहर की सीवर व्यवस्था सुधारने में जुटा है, लेकिन अधिकारियों और ठेकेदारों के गठजोड़ के कारण आज तक सीवर समस्या का समाधान नहीं हुआ। जल निगम के एक रिटायर्ड अधिकारी ने बताया कि 898 किमी सीवर पाइप लाइन बिछाई गई, लेकिन इससे गुजरने वाले सीवर का ट्रीटमेंट कहां होगा। इसके लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का निर्माण पहले नहीं कराया। पाइप लाइन पड़ गई तब विचार किया गया कि एसटीपी कहां बनेगा। काफी हो हल्ला मचने के बाद जब एसटीपी का निर्माण हुआ तब तक कई किलोमीटर में डाली गई पाइप लाइनें खराब हो गईं। जो टेस्टिंग में ही फेल साबित हो रही हैं। इन पाइपों को बदलने का काम शुरू हुआ है। यह सब कुछ गठजोड़ का ही परिणाम है।
बेतरतीब काम के चलते सीवर समस्या
बगैर कार्ययोजना के सीवर व्यवस्था सुधारने का दिखावा किया गया। जब सब भेद खुला गया तब सुधारने की कवायद की जा रही है। पाइपों को जोड़ने, नई पाइप डालने का काम कई जगहों पर जारी है। रामकटोरा के पास शाही नाले को एसटीपी से जोड़ा जा रहा है ताकि सीवर का ट्रीटमेंट हो सके। इसके अलावा वरुणा पार इलाके में नई पाइप लाइन डालने और सीवर का कनेक्शन का काम बचा है। यह काम दिसंबर के पहले पूरा नहीं होगा। अस्सी नाले को टैप किया जा रहा है।
शहर के सीवर शोधन क्षमता
सीवर शोधन के लिए डीरेका में आठ एमएलडी व भगवानपुर में 11 एमएलडी क्षमता का एसटीपी है। इसके अलावा दीनापुर ट्रीटमेंट प्लांट है जिसकी क्षमता 90 एमएलडी शोधन की थी। ऐसे में कुल मिलाकर 110 एमएलडी सीवर की है। इसके अलावा दीनापुर और गोइठहां में 100 एमएलडी सीवर ट्रीटमेंट हो रहा है। अब भी तकरीबन 90 एमएलडी सीवर और नाले से गंदा पानी गंगा में जा रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो जुलाई से गंगा में सीवर न गिरने का दावा जल निगम के अधिकारी कर रहे हैं।
शाही नाले पर निर्भर शहर की सीवर व्यवस्था
शहर की सीवर व्यवस्था शाही नाले पर निर्भर है। मुगल कालीन सुरंग ने 1822 में ब्रिटिश काल में शाही नाले का रूप ले लिया। इसकी गोलाई चार से आठ फीट तक की है। जिसमें आदमी आराम से इसमें आ जा सकता है। ब्रिटिश काल से अब तक यह शाही नाला ही शहर का मुख्य सीवर निकासी का माध्यम है। जिसकी आजतक मरम्मत पूरी नहीं हो सकी। इसके संपर्क नालों को ब्लॉक कर दिया गया। इसके चलते शहर की सीवर व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई। जगह-जगह सीवर ओवर फ्लो की शिकायत आने लगी।
नक्शा न होना भी बना रोड़ा
नक्शा न होने के कारण नाले को जानने के लिए रोबोटिक सर्वे कराया गया। इसके बावजूद अब तक सफलता नहीं मिली है। इसके लिए जापान इंटरनेशनल कोआपरेशन एजेंसी (जायका) ने 92 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। अब जल निगम की गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की निगरानी में मरम्मत का काम चल रहा है। शहर की घनी आबादी से होकर गुजरने वाला यह नाला पूरी तरह भूमिगत है। लोगों का मानना है कि 1990 के बाद यहां सीवर समस्या हुई। जब इसकी लाइनों में छेड़छाड़ किया जाने लगा तब से समस्या उत्पन्न हुई।
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सीवर समस्या के समाधान किया जा रहा है। शाही नाले के डायवर्जन का काम चल रहा है। इसके अलावा वरुणा पार और शहर के कुछ इलाकों में काम चल रहा है। दिसंबर तक सीवर से जुड़ी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। सभी एसटीपी पूरी क्षमता से चलेंगे। - एके पुरवार, मुख्य अभियंता जल निगम
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