सिंचाई विभाग ने किसानों की सहूलियत के लिए 37 साल साल पहले लखमीपुर माइनर योजना बनाई थी लेकिन अब तक परवान नहीं चढ़ सकी। इसमें सात किमी नहर बनानी थी लेकिन मात्र तीन किमी नहर ही बनी है।
1980 में चकबंदी के दौरान किसानों से इसके लिए जमीन ली गई थी। यह जमीन आज भी नहर के नाम पर आरक्षित है। इस दौरान कई पार्टियों की सरकारें आईं। विभागीय अधिकारी आए-गए लेकिन किसानों की सुध नहीं ली गई।
योगी की सरकार बनने के बाद किसानों को आस है कि अब नहर बन जाएगी और वर्तमान दर से मुआवजा भी मिल जाएगा। किसानों से नहर के नाम पर ली गई जमीन बंदोबस्ती नक्शे में दर्ज है। इसमें नहर की लंबाई-चौड़ाई भी दर्ज हो गई। 37 साल बाद भी न तो नहर बनी और न ही किसानों को मुआवजा मिला।
थक-हार कर किसान नहर के लिए छोड़ी गई जमीन पर फिर से खेती करने लगे। ज्ञानपुर माइनर से निकल कर गंगापुर रामरायपुर होते हुए बनकट रेलवे लाइन के दक्षिणी छोर तक खुदाई हुई। इसके आगे की खुदाई आज तक नहीं हो पाई।
1980 में सरकार की ओर से किसानों के लिए एक योजना चलाई गई की खेती के लिए पानी भी मिल जाए और बाढ़ आए तो किसानों का नुकसान भी न हो। सिंचाई विभाग की ओर से ज्ञानपुर माइनर से वरुणा नदी को नहर की माध्यम से जोड़ने को लिए योजना बनी थी।
ज्ञानपुर प्रखंड नहर गंगापुर से निकल कर वरुणा नदी तक नहर बननी थी। जब सन 80 में चकबंदी हुई तो किसानों की जमीन नहर के नाम पर 11 प्रतिशत की कटौती कर दी गई। बंदोबस्ती नक्शे में अस्सी कड़ी यानि लगभग पचास फीट चौड़ी नहर बनना है।
अकेलवा तक तो नहर की खुदाई हुई पर उसके बाद खुदाई ही नहीं हुई। बनकट, नेवादा, सुरही, परजनपुर, मंगलपुर, सरहरी, कोटवा, कोरौती गिरधरपुर, अयोध्यापुर सिरसा से होते हुए वरुणा नदी में मिलना था। इस नहर से हजारों एकड़ खेतों की सिंचाई हो सकती थी।