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श्रावणी फुहार : घिर आई है कारी बदरिया पिया बिनु लागे ना मोरा जिया

Tue, 25 Jul 2017 04:21 PM IST
amarujala.com, written by अनूप ओझा
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आस्था गोस्वामी - फोटो : अमर उजाला
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सावन सुनते ही जेहन में हरियाली छा जाती है। मन हरा-भरा हो जाता है। मेहंदी से हथेलियां सजने लगती हैं। डालियों पर उमंग के झूले पड़ जाते हैं। सुंदर तरीके से सजी हुई ब्रजनारियां, हरी-हरी लहरिया पहनकर खिलखिलाती युवतियां और भर बांह हरी चूड़ियां पहनकर ठिठोली करती सखियां-सहेलियां सावन को जीने लगती हैं।
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 गाई जाने लगती है विरह की कजरी। सावन विरहिनी के लिए सबसे मदमस्त महीना होता है। प्रियतम के न होने पर उसे न तो बादलों की उमड़-घुमड़ सुहाती है न सावन की फुहारें। वह काली घटाओं को देख तड़प उठती है। यह हाल हर नायिका का होता है।

यह कहना है बनारस घराने की ठुमरी गायिका आस्था गोस्वामी का। आस्था बताती हैं कि उनको अच्छी तरह याद है जब उनकी शादी नहीं हुई थी और सावन का महीना आता था तब वह खुद बादलों को देखकर झूम उठती थीं। सखियों को बादलों का रंग देख बुलाती थीं। गीत उठने लगते थे।
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वह राग पीलू में कजरी की बंदिश पर आलाप लेती हैं- राधे झूलन पधारो झुकि आए बदरा/साजे सकल शृंगार दियो नैया कजरा, पहिरो पचरंग सारी ऊपर श्याम चदरा...। घटाओं के सौंदर्य पर वह दूसरी ठुमरी गायिका गिरिजा देवी की प्रिय बंदिश सुनाती हैं- घिर आई है कारी बदरिया पिया बिन लागे ना मोरा जिया...।

वह बताती हैं कि सावन में ही स्त्रियों के सारे भाव जीवंत हो उठते हैं। वृंदावन में जहां ठाकुर जी फूल बंगला सजाकर ब्रजनारियां कजरी, झूला के पद गाने लगती हैं, वहीं बनारस-मिर्जापुर में अलग मिजाज की कजरी शुरू हो जाती है। वह घटाओं के घिरने पर राग गौड़ मल्हार में कजरी की बंदिश का उदाहरण देती है- देख युगल छबि सावन लागे/इत घन उत घन श्याम लाडिलो...।

फिर वह राग मेघ में किराना घराने की बंदिश गुनगुनाती हैं- छाई घटा घनघोर चहुंओर गरज गरज चमकत बिजुरिया....। वह बताती हैं कि बादलों की उमड़-घुमड़ का एहसास मीड़ और गमक की प्रधानता के जरिए कराया जा सकता है। राग प्रकृति से सीधा वह रिश्ता जोड़ने की ताकत रखते हैं जो उस पुरवाई को, घटाओं को और बिजुरी की चमक को महसूस करा सके।

वह कहती हैं कि सावन आ जाए तो पिया घर नहीं हों तो सब किरकिरा हो जाता है। मन में गीत उठने लगता है- सावन की रुत आई रे सजनिया प्रीमत घर नहिं आए...। लगता है कि जैसे सावन में वर्षा होते ही मयूर नाचने लगता है, वैसे ही स्त्रियां उमंग से भर जाती हैं।

वर्षा की बूंदों की ठंडक को महसूस करने के लिए वह प्रीतम को अपने पास चाहती हैं। इसके लिए तड़प उठती हैं। कम उम्र में अकेलापन और भी उन्हें सहा नहीं जाता। प्रसंग मिलता है-बारी उमर और रैन अंधेरी रहि रहि जिया घबराए...। सावन की फुहारों में नायिका अपने प्रियतम को याद कर कहती है वह होते तो वह इस आनंद को साझा कर पाती।
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