वाराणसी। ओडिसी नृत्य गुरु पं. केलूचरण महापात्रा की पुरानी बंदिशों पर शनिवार की रात उनके पुत्र और पुत्रवधू ने रामायण -महाभारत के कथानकों को लय-ताल में निबद्ध किया। संकट मोचन के दरबार में ओडिसी नृत्य की थिरकन में हनुमान वंदना से जटायु मोक्ष तक के आध्याम के भावों का रसपान कर संगीतप्रेमी खूब अघाए।
सतीश व्यास के संतूर पर झंकृत तारों से रात निखरी, तो नई पीढ़ी के उभरते ख्याल गायक समीहन कसालकर ने अलापचारी से रागों की नई खुशबू का एहसास कराया। संकट मोचन संगीत समारोह की चौथी निशा इसी तरह गायन, वादन और नृत्य के संगम तट में तब्दील हुई।
आगाज हुआ भुवनेश्वर से आए पं. रतिकांत महापात्रा और उनकी पत्नी सुजाता महापात्र के ओडिसी नृत्य से। राग कल्याण में एक ताल में निबद्ध बंदिश के बोल वंदे संतम श्री हनुमंतम... पर भावपूर्ण थिरकन से उन्होंने संकट मोचन की आराधना की। इसके बाद सुजाता ने राग हंसध्वनि में निबद्ध बंदिश पर पल्लवी की प्रस्तुति की। रतिकांत ने इनके बाद अष्टपदी पर गीत गोविंदम को नृत्य रचना में साकार किया।
राग गुजरी तोड़ी में बंदिश के बोल थे-प्रिये चारुशिले...। सुजाता ने फिर उड़िया गीत पर कृष्ण लीला में पूतना वध, बकासुर वध, कालियानाग मर्दन, विश्वरूप दर्शन के भावों को पिरोया। अंत में दोनों पति-पत्नी ने जटायु मोक्ष की मनोहारी प्रस्तुति की।
इनके बाद मुंबई के पं.सतीश व्यास ने संतूर पर राग वागेश्री की अवतारणा की। अलाप, जोड़, झाला के बाद इन्होंने विलंबित और द्रुत लय में बेजोड़ गतकारी की। तबले पर संगत की ओजस अथिया ने। इनके बाद मंच पर आए मुंबई के ही समीहन कसालकर। इन्होंने राग मालकौस में विलंबित एक ताल की रचना से शुरुआत की। बंदिश के बोल थे- दया करो रघुनाथ...। तबले पर संगत की पं. सुरेश तलवरकर ने। हारमोनियम पर तन्मय देवचके थे।