फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फर्जी शासनादेश से विक्रय अधिकारी बन गए निदेशक

विज्ञापन
विज्ञापन
वाराणसी। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में फर्जी शासनादेश के जरिए पदोन्नति पाने का मामला सामने आया है। जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने के बाद शासन ने विश्वविद्यालय प्रशासन को निदेशक प्रकाशन पद पर विक्रय अधिकारी की पदोन्नति को निरस्त करने का निर्देश दिया है। साथ एफआईआर दर्ज कराने को कहा है।
विज्ञापन

15 दिसंबर 2017 को हरिवंश कुमार पांडेय ने मुख्यमंत्री को भेजी शिकायत में विश्वविद्यालय निदेशक प्रकाशन संस्थान के पद पर डॉ. पद्माकर मिश्र की पदोन्नति को गलत ठहराया था। आरोप था कि विश्वविद्यालय ने 2010 में निदेशक के पद पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला। तत्कालीन विक्रय अधिकारी डॉ. पद्माकर मिश्र ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों से साठगांठ कर फर्जी आदेश तैयार करा लिया। शासनादेश की प्रति 15 जनवरी 2004 को विश्वविद्यालय में प्राप्त होना दिखाया गया, जबकि इस दिन विश्वविद्यालय में अवकाश था। शिकायतकर्ता ने 7 जनवरी 2013 को तत्कालीन कुलसचिव और कुलाधिपति को पत्र भेजकर इस अनियमितता की सूचना दी थी। उच्च शिक्षा विभाग के सचिव रमेश मिश्रा ने 2018 में दो सदस्यीय जांच कमेटी गठित की थी। मार्च 2018 को जांच कमेटी ने शासन को रिपोर्ट सौंपी, जिसमें विश्वविद्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जीवाड़ा किए जाने की बात कही। इसके बाद बीती 17 सितंबर सचिव आर. रमेश कुमार ने शासनादेश निरस्त करने और एफआईआर कराने के निर्देश दिए।
शासन के आदेश का पालन कराया जाएगा। विधिक रूप से जो भी सही होगी, कार्रवाई की जाएगी। -राजबहादुर, कुलसचिव
शासनादेश पर फर्जी मिले हस्ताक्षर
वाराणसी। सचिव की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि विक्रय अधिकारी को निदेशक प्रकाशन के पद पर पदोन्नति का शासनादेश फर्जी है। जांच में पता चला कि शासनादेश पर अंकित हस्ताक्षर कूट रचित हैं। इस वजह से उक्त शासनादेश को निरस्त किया जाता है। साथ ही एफआईआर भी दर्ज कराई जाए। सचिव ने निर्देश दिया है कि निर्देशों का कड़ाई से पालन कराया जाए।
विज्ञापन

पूर्व कुलपति की भूमिका पर भी है संदेह
जांच कमेटी ने पूर्व कुलपति प्रो. यदुनाथ प्रसाद दुबे की भूमिका पर भी संदेह जताया है। कमेटी ने लिखा है कि कुलपति से जब इस मामले की जानकारी मांगी गई तो उन्होंने बताया था कि हाईकोर्ट ने डॉ. पद्माकर मिश्र की नियुक्ति और शासनादेश को वैध मानते हुए हरिवंश पांडेय की याचिका खारिज कर दी थी। इसलिए उच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात शासन स्तर से शिकायत करना नियम विरुद्ध और वैधानिक नहीं है। कुलपति ने पत्र में लिखा था कि उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद किसी को भी टीका टिप्पणी का अधिकार नहीं है। कमेटी ने माना था कि कुलपति के दोनों पत्रों की विवेचना से स्पष्ट होता है कि मामले में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों एवं कर्मचारियों की अनुचित संलिप्तता है। विवादित शासनादेश के जारी होने में भी उनकी संलिप्तता है। कुलपति द्वारा अपने पत्रों से जांच समिति को भी भ्रमित करने का प्रयास करना प्रतीत होता है। इस संदर्भ में पूर्व कुलपति प्रो. यदुनाथ प्रसाद दुबे का कहना है कि अभी उन्हें इस मामले में कोई जानकारी नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें