‘काशी मरत परम पद ललहीं...।’ संत तुलसीदास की इस चौपाई का अर्थ है कि काशी में जिसकी मृत्यु हो जाए, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है लेकिन इस नगरी में अब मोक्ष के मायने बदल गए हैं। जहां कभी लोग मोक्ष के लिए आते थे, वहां अब असि नदी की पावन धारा नहीं, नाला बजबजा रहा है।
कारखानों के प्रदूषित जल के साथ ही शहर के एक बड़े हिस्से के घरेलू डिस्चार्ज की पाइप लाइन असि नदी से जोड़कर इसे नाले में तब्दील कर दिया गया है। आसपास के सीवर का अवजल सड़ने और दुर्गंध उड़ने से सांस लेना मुश्किल हुआ है, दूसरी ओर लोग मोक्ष के लिए वहीं पर डेरा जमा रहे हैं।
पुराणों में असि-गंगा संगम की महिमा सम्मेद तीर्थ के रूप में की गई है। यानी वहां संसार के तीर्थ उसके षोडशांश के बराबर भी नहीं होते। इसी धारणा को लेकर अस्सी मुहल्ले में असि नदी के तट पर मुमुक्षु भवन की स्थापना की गई। असि-गंगा संगम से पहले असि के तट पर बने मुमुक्षु भवन में लोग मोक्ष के लिए प्रवास करने आते हैं लेकिन अब वहां भवन की दीवार से लगी असि नदी नाले में तब्दील कर दी गई है। असि की तलहटी में सीवेज पंपिंग स्टेशन बना दिया गया है, जो वर्षों से ठप है। नदी क े बीच चार फुट का नाला निकाल दिया गया है।
भदैनी के पार्षद गोविंद शर्मा का कहना है कि असि नदी में सीवर बहाए जाने से आस्था तो प्रभावित हो ही रही है, मुहल्ले में बीमारियां भी फैल रही हैं। इस नदी के उद्धार के लिए नगर निगम के अलावा जिला प्रशासन को ठोस कदम उठाना चाहिए। गोविंद कहते हैं कि इस नदी के उद्धार के लिए वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द ही पत्र भेजेंगे और सचाई से अवगत कराया जाएगा।