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सलिलं वर्षय वर्षय वर्षय

Tue, 19 Jul 2016 01:56 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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प्रो. शशि कुमार
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घटाएं आषाढ़, सावन , भादों में एकसार हो जीवन का संगीत रचती हैं। वर्षा ऋतु के आते ही धरती मुस्कुरा उठती है और आसमान मेघों से लद जाता है। कवि नागार्जुन की कल्पना मेें - आषाढ़ की बारिश मौसम का पहला वरदान है.. तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला लिखते हैं कि- अलि घिर आए घन पावस के...। उत्तर के संगीत में मेघ और मल्हार जैसे राग फूटते हैं तो दक्षिण के कर्नाटक संगीत में इस ऋतु में गाया जाने वाला राग है अमृतवर्षिणी। इस अंक में दक्षिण के वर्षाऋतु के इस राग पर प्रस्तुत हैं- बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय में गायन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के शशि कुमार के अनुभव।
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भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो धाराएं हैं। एक भारतीय शास्त्रीय संगीत है तो दूसरा दक्षिण के कर्नाटक शैली का संगीत। दोनों संगीत धाराओं में पावस ऋतु के रागों की प्रधानता है। उत्तर में मेघ और मल्हार है तो दक्षिण अमृतवर्षिनी। अमृत वर्षिनी कर्नाटक संगीत पद्धति का पावस ऋतु प्रधान राग है। इसकी स्वर संगतियां उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग मालश्री के समान माधुर्य बिखेरती हैं। यह कहना है प्रो. के शशि कुमार का। वह इसकी विशेषताएं गिनाते हैं कि राग अमृतवर्षिणी कर्नाटक संगीत के बहत्तर मेल कर्ता पद्धति के अंतर्गत उनतालीसवां मेल राग झालवराली से निकलता है। इस राग में उत्तर उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के रागश्री की भी छाया देखने को मिलती है। इस राग की अवतारणा में घटाओं की उमड़-घुमड़,बिजली की कड़क-चमक का स्पष्ट एहसास होता है। वह एक दंतकथा से इस राग की महिमा जोड़ते हैं।


कहते हैं कि एक बार संत मुत्थुस्वामी दिक्षितर घूमते-घूमते तमिलनाडु के एट्टैयापुरम गांव  में पहुंचे थे। तब वहां घनघोर सूखा पड़ा था। बारिश के बिना धरती तड़प रही थी और सभी व्याकुल थे। गांव के लोगों ने उनसे ऐसा उपाय लगाने की अरज लगाई, जिससे बारिश हो सके। तब उन्होंने राग अमृतवर्षिनी की बंदिश- आनंदामृत वर्षिणी अमृतवर्षिणी हरादिपूजिते भवानी... को उन्होंने आलाप दिया। कुछ देर में ही काले बादल घिर आए थे। इसके बाद उन्होंने दूसरी बंदिश-सलिलं वर्षय वर्षय वर्षय... को स्वर दिया। इसके बाद इतनी बारिश हुई कि बाढ़ आ गई। दोबारा ग्रामीणों ने जब संत से बादलों को थिर रखने की प्रार्थना की, तब उन्होंने इसी राग में दूसरी बंदिश गाया था- सलिलं स्तंभे स्तंभे स्तंभे...।दक्षिण के गांवों में यह घटना अब भी  दोहराई जाती है। के. शशि कुमार कहते हैं कि कर्नाटक संगीत में राग मेघ मल्हार का प्रभाव मिलता है। कर्नाटक पद्धति के राह मध्यमावती और वृंदावनी सारंग की स्वर संगतियों में समानता पाई जाती है।
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