चौदह सौ तैंतीस की माघ सुदी पंदरास/दुखियों के कल्यान हित प्रकटे गुरु रविदास...। संत कर्मदास के इस दोहे के अलावा अन्य शोध कार्यों के जरिए गुरु रविदास का जन्म सीर गोवर्धन गांव में होने के प्रमाण मिलते हैं।
‘रविदास की जीवन कथा’ नामक पुस्तक में संत कर्मदास ने जिक्र किया है कि पिता संतोख दास और माता कलसी देवी की कोख से सीरगोवर्धन गांव में ही संत रविदास का जन्म माघ सुदी 15 पूर्णिमा के दिन 1377 ई. में हुआ था।
विधान परिषद में सपा एमएलसी शतरुद्र प्रकाश के सवाल पर सरकार की ओर से संत रविदास का जन्मस्थान सीर गोवर्धन के बजाय मंडुवाडीह स्वीकार किए जाने पर अनुयायियों में नाराजगी है। संत रविदास जन्मस्थान पब्लिक चैरिटबेल ट्रस्ट के प्रबंधक ज्ञान चंद कहते हैं कि यह बयानबाजी राजनीति से प्रेरित है या फिर किसी का अधूरा ज्ञान।
प्रदेश सरकार के इस जवाब से अनुयायियों की भावना आहत हुई है...। फिलहाल इस प्रसंग को लेकर अतीत के पन्ने पलटे जाने लगे हैं। साहित्यकारों, विद्वानों और शोधार्थियों में वैचारिक जंग छिड़ गई है...।
‘जन्म जाति को छांड़ि करि करनी जात प्रधान/इह्यो वेद को धर्म है कहे रविदास बखान...’ दुख तकलीफ, जाति भेद और छुआछूत से परे बेगमपुरा शहर बसाने का संदेश देने वाले संत रविदास के सीरगोवर्धन में जन्म लेने के अनेक प्रमाण शनिवार को मंदिर प्रबंधन की ओर से दिए गए।
संत श्रवण दास ने की थी सीरगोवर्धन जन्मस्थान की खोज
संत रविदास की जन्मस्थली
- फोटो : अमर उजाला
स्वर्ण गुंबदों वाले भव्य मंदिर परिसर में विधान परिषद में सरकार के इस कथन को लेकर दिन भर बहस होती रही कि गुरु रविदास का जन्मस्थान सीरगोवर्धन है या नहीं? संत रविदास जन्मस्थान पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के जनरल सेक्रेटरी सत्यपाल विरदी ने जालंधर से फोन पर मंदिर प्रबंधन से प्रकरण की जानकारी ली।
उन्होंने ‘अमर उजाला’ को बताया कि ऐसा हो नहीं सकता। सरकार से सदन में इस धार्मिक मसले पर अपना पक्ष रखने में जल्दबाजी या चूक हुई है। इसे सुधार लिया जाना चाहिए। इससे दुनिया भर में फैले 20 करोड़ से अधिक रविदासिया अनुयायियों की भावना आहत होगी। सीरगोवर्धन जन्मस्थान रविदासिया अनुयायियों के लिए मक्का-मदीना जैसा तीर्थ है।
जन्मस्थान चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रबंधक ज्ञानचंद बताते हैं कि डेरा सचखंड बल्ल के संत श्रवण दास, पिप्पल दास, संत हरिदास और संत गरीब दास को गुरु रविदास के जन्मस्थान सीरगोवर्धन की खोज करने का श्रेय जाता है। संत श्रवण दास की प्रेरणा से सीरगोवर्धन में 14 जून 1965 को संत हरी दास ने गुरु रविदास मंदिर की नींव रखी थी।
ज्ञानचंद बताते हैं कि मंदिर के पास वह इमली का पेड़ अब भी मौजूद है जिसके नीचे गुरु रविदास शिष्यों को मानवता का संदेश देते थे। संत हरिदास ने जब मंदिर की नींव रखी तब इमली का पेड़ सूखा हुआ था लेकिन लगातार पानी देने से उसकी जड़ों से कल्ले फूटने लगे।
अब वह इमली का पेड़ विश्व भर के रविदासियों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। वहां महिलाएं फेरी लगाती हैं और लोग माथा टेककर निहाल होते हैं। शनिवार को सीरगोवर्धन में तमाम आस्थावान इमली के पेड़ की परिक्रमा करते नजर आए।
संत रविदास के हाथ की निशानी सीर में सुरक्षित
संत रविदास की जन्मस्थली
- फोटो : अमर उजाला
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ का संदेश देने वाली संत रविदास के हाथ की निशानी वह कठौती भी सीरगोवर्धन के मंदिर में श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखी हुई है। अब उस कठौती को धरोहर के तौर पर मढ़वा कर सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के ट्रस्टी केएल सरोवा बताते हैं कि इसी कठौती के जल से गुरु रविदास ने मीराबाई को अमृत रूपी ज्ञान का पान कराया था।
संत गुरु रविदास जन्मस्थान पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट प्रबंधक ज्ञानचंद ने बताया कि सीरगोवर्धन में संत गुरु रविदास के जन्मस्थान पर टिप्पणी बहुत नाजुक मामला है। इस स्थान को सरकार पहले ही तथ्यों के आधार पर हेरिटेज घोषित कर चुकी है। प्रदेश सरकार के किसी मंत्री से अगर गलती हुई है तो उसे सुधार लिया जाना चाहिए।