जीआई एक्सपर्ट डॉ. रजनीकांत बताते हैं कि काशी में गोलघर से विशेश्वरगंज तक 50 घरों में गुलाबी मीनाकारी का सालाना 500 करोड़ से अधिक का कारोबार हो रहा है। बनारस के अलावा मीनाकारी कला भारत के कई अन्य शहरों जैसे राजस्थान के जयपुर, उदयपुर और बीकानेर में भी प्रचलित है। इसके अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में भी यह कला सीमित मात्रा में की जाती है। बनारस की मीनाकारी विशेष रूप से अपनी गुलाबी मीनाकारी के लिए प्रसिद्ध है। काशी की गुलाबी मीनाकारी को जीआई टैग भी मिला है। वहीं, प्रदेश सरकार ने इसे ओडीओपी में भी शामिल किया है।
800 डिग्री सेल्सियस तापमान पर निखरती है चमक
कुंज बिहारी सिंह बताते हैं कि गुलाबी मीनाकारी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गुलाबी रंग गोल्ड ऑक्साइड से तैयार किया जाता है। इसे चंदन के तेल में मिलाकर अत्यंत सूक्ष्मता से लगाया जाता है। इसके बाद इसे लगभग 800 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पकाया जाता है, जिससे इसका रंग और चमक स्थायी रहती है। फारस (परिशया) से आकर काशी की मिट्टी में रची-बसी इस कला में गोल्ड ऑक्साइड और विशेष प्राकृतिक तत्वों (जैसे चंदन का तेल) का उपयोग करके गुलाबी रंग तैयार किया जाता है। उच्च तापमान वाली भट्टी में तपकर तैयार होने के कारण यह मीना धातु के ऊपर तैरता नहीं, बल्कि उसमें समा जाता है। शिल्पकारों के अनुसार, यह मीना समय के साथ शरीर की गर्मी पाकर और अधिक चमकदार होता जाता है। इस वजह से विदेशी खरीदार इसके मुरीद हैं। विदेशी बाजारों की मांग के अनुसार अब पारंपरिक गहनों के अलावा आधुनिक वेस्टर्न वियर के साथ पहनने योग्य फ्यूजन ज्वेलरी, पेंडेंट और ईयररिंग्स भी बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट हो रही है।