रोहू, टेंगरा और भोला समेत चार मछलियों के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट (जीआईटी) और मांसपेशियों में माइक्रोप्लास्टिक मिले हैं। रोहू का सेवन सबसे ज्यादा किया जाता है। वाराणसी क्षेत्र से चार प्रजाति की मछलियों कॉमन क्रॉप (साइप्रिनस कार्पियो), टेंगरा मछली (स्पर्टा ऑर), भोला मछली (जॉनियस क्वॉइटर) और रोहू (लेबियो बाटा) पकड़ी गईं।
इनके 62 नमूनों की गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट (जीआईटी) और मांसपेशियों की जांच की गई। इससे पता चला कि मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक हैं। 66 फीसदी मछलियों में जीआईटी और 15 फीसदी मछलियों की मांसपेशियों में माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए। सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक रोहू मछली में मिले हैं।
मेटाबॉलिज्म कर सकते हैं प्रभावित
शोध कर रहे बीएचयू के डॉ. कृपाराम ने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक्स केवल पर्यावरण तक ही सीमित नहीं हैं। ये मानव शरीर जैसे मल, रक्त, प्लेसेंटा और फेफड़ों में भी पाए गए। नॉन डिग्रेडेबल होने की वजह से इन्हें आसानी से पचाया नहीं जा सकता है।
निगले गए माइक्रोप्लास्टिक के लिए पाचन तंत्र प्राथमिक संचित स्थल होते हैं। एक बार जब वे मानव शरीर में प्रवेश करते हैं तो आरओएस उत्पादन और एंटीऑक्सीडेंट प्रणाली के बीच असंतुलन के कारण तनाव पैदा कर सकते हैं। इससे शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर पड़ सकता है।
डॉ. कृपाराम के मुताबिक विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने माइक्रोप्लास्टिक के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में चेतावनी दी है। हालांकि अभी यह तय नहीं हो पाया कि माइक्रोप्लास्टिक मानव स्वास्थ्य को कितना नुकसान कर सकता है। देश में मीठे पानी की मछली, जो मानव उपभोग के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है, उसमें एमपी की मौजूदगी और उसके प्रभावों पर और शोध की जरूरत है।
गंगा में जा रहे प्लास्टिक से बढ़ी दिक्कत
नालों और अन्य स्रोतों से गंगा में जा रहे प्लास्टिक कचरे से माइक्रोप्लास्टिक का स्तर बढ़ा है। प्लास्टिक का कचरा लंबे समय तक धूप में रहता है तो टूटकर पानी में मिल जाता है, फिर जल्द नष्ट नहीं होता है। माइक्रोप्लास्टिक एक से 5000 माइक्रोमीटर आकार के बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं। ये मिट्टी, हवा, पानी और सड़क की धूल जैसे विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में पाए जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पर गंभीर चिंता जताई है।