5000 साल पहले 1700 किलोमीटर लंबी समुद्री यात्रा करके लाओस से आए लोगों ने निकोबार द्वीप पर घर बसाया। इनके पूर्वज 12 हजार पहले जन्मे होलोसीन मानव थे। इसे लेकर बीएचयू के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए रिसर्च को यूरोपियन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ।
5000 साल पहले 1700 किमी लंबी समुद्री यात्रा करके आए मानवों ने निकोबार द्वीप पर अपना घर बसाया था। ये दक्षिण पूर्व एशियाई देश लाओस से आए थे। इनके पूर्वज 12 हजार साल पहले जन्मे होलोसीन आदिमानव थे। निकोबार के सात छोटे द्वीपों पर आज इस वर्ग के 25 हजार लोग दुनिया से अलग-थलग रहते हैं। इन्हें निकोबारिज के नाम से जाना जाता है। बीएचयू और सीसीएमबी हैदराबाद की ओर से 1,559 लोगों पर किए गए अध्ययन में ये निष्कर्ष सामने आए हैं। ये शोध यूरोपियन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित है।
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शोध में सामने आया कि इन जनजातियों के पास आज भी लाओस में रहने वाले होलोसीन मानव वाला ही प्योर डीएनए है, क्योंकि इन्होंने अपने वर्ग के बाहर के लोगों से कोई संबंध स्थापित नहीं किया। बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और सीएसआईआर-सीसीएमबी के डॉ. के थंगराज समेत नौ संस्थानों के 12 वैज्ञानिकों ने पांच लाख से ज्यादा डीएनए मार्कर्स का अध्ययन किया।
डॉ. के थंगराज ने बताया कि ये डीएनए मार्कर्स मां-बाप से बच्चे यानी एक से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होते हैं। निकोबारिज के डीएनए के पूर्व स्थान का पता लगाने के लिए दक्षिण पूर्व एशियाई, एशिया और दक्षिण एशिया आबादी के डीएनए से मैच कराया गया। इसमें दक्षिण पूर्व एशियाई लोगों के साथ समानता देखने को मिली।
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आज इन लोगों से मिलता है डीएनए
टीम के वैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज वैन ड्रिएम ने कहा कि आज दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली तिन-माल नाम की जनजातियों का डीएनए निकोबार के लोगों से काफी मिलता है। ये वो लोग हैं जो कि दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे पुरानी भाषा ऑस्ट्रोएशियाटिक बोलते हैं। प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि मॉलिक्यूलर डेटिंग की मदद से इनके निकोबार में बसने के काल का पता लगाया गया।
इस शोध से निकोबार को समझने में मिलेगी मदद
खास बात ये है कि इन्हीं के समय भारत में संथान और मुंडा जनजातियां आईं। इनमें पुरुष ज्यादा थे जबकि निकोबारिज में महिला और पुरुष दोनों समान रूप से आए। 2003 में डॉ. लालजी सिंह और डॉ. थंगराज ने निकोबार से सैंपल कलेक्ट किया था। प्रो. चौबे ने कहा कि निकोबारिज भारत की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक है। अभी तक इनमें 5000 साल प्राचीन ऑस्ट्रोएशियाटिक ग्रुप के जीन हैं।
इस अध्ययन के बाद निकोबार के लोगों को समझने में काफी मदद मिलेगी। यहां की संस्कृति और विरासत के अनुसार ही विकास कार्य कराए जा सकते हैं। ऐसे लोगों का डीएनए प्योर है, तो इतिहास में मानव विकास कई तरह के बड़े रिसर्च किए जा सकते हैं। दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच बेहतर संबंध प्रगाढ़ होंगे।
बीएचयू के आर्कियोलॉजी के डॉ. सचिन तिवारी ने कहा कि इससे पहले दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच पुरातात्विक संबंध थे। यानी दोनों जगहों के मंदिर व अन्य पुरातात्विक वस्तुओं में समानता थी। लेकिन, अब ये भी साबित हो गया कि उनके बीच डीएनए का भी लिंक है।
इन 12 वैज्ञानिकों की टीम ने किया रिसर्च
इस शोध टीम के अन्य सदस्यों में बीएचयू से डॉ. राहुल मिश्र, डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह, शैलेश देसाई, प्रतीक पांडेय, बीएसआईपी लखनऊ से डॉ. नीरज राय, कलकत्ता यूनिवर्सिटी से डॉ. राकेश तमांग और अमृता विश्वविद्यापीठम से डॉ. प्रशांत सुरावझाला थे।