इस प्राचीन मूर्ति का अध्ययन और अवलोकन प्रमुख पुरातत्वविदों डॉ. सचिन तिवारी, डॉ. राकेश तिवारी, और प्रोफेसर वसंत शिंदे द्वारा किया गया। तीनों विशेषज्ञों ने इसे गुरजर–प्रतिहार काल (9वीं–10वीं सदी ईस्वी) की शैली का उदाहरण बताया है, जो काशी–सारनाथ कला परंपरा से प्रभावित है।
डॉ. सचिन तिवारी ने कहा कि इस मूर्ति का शिल्प प्रतिहार काल की उत्कृष्ट कला का परिचायक है। इसमें उस युग की सौम्यता और स्थानीय कारीगरों की निपुणता स्पष्ट झलकती है।
डॉ. राकेश तिवारी के अनुसार, गंगा के किनारे इस प्रकार की मूर्तियों का मिलना इस बात का संकेत है कि यहां कभी एक सक्रिय शैव मंदिर या मठ रहा होगा। वहीं, प्रो. वसंत शिंदे ने कहा कि यह खोज वाराणसी के आसपास के पुरातात्त्विक परिदृश्य को नया आयाम देती है। मूर्ति की शैली और पत्थर से यह स्पष्ट है कि यह स्थानीय शिल्पियों द्वारा निर्मित प्राचीन कृति है। प्रोफेसर चौबे ने बताया कि भविष्य में इस स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और संरक्षण कार्य प्रस्तावित है, ताकि मूर्ति और संबंधित स्थल का उचित अभिलेखन किया जा सके।