खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
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बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...की कविता जब गूंजी तो हर एक चेहरे पर स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के प्रति श्रद्धा छलक उठी।
मौका था सोमवार को वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के 160वें बलिदान दिवस पर वाराणसी के भदैनी स्थित लक्ष्मीबाई के जन्मस्थली पर आयोजित समारोह का। जागृति फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान झांसी की रानी के बलिदान और शौर्य को नमन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। वक्ताओं ने कहा कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने शौर्य का जो प्रतिमान स्थापित किया है, वह सभी के लिए अनुकरणीय है।
स्त्री को अबला समझा जाता है लेकिन वह जरूरत पड़ने पर समाज को बदलने का काम कर सकती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विजय बहादुर सिंह ने कहा कि काशी की इस बेटी ने पूरे देश में भारत की एक अलग छवि पेश की।
अंजलि अग्रवाल ने कहा कि लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को यह एहसास दिलाया कि यह वह भारत देश है, जहां पुरुषों के साथ महिलाएं भी देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर सकती हैं।
रानी लक्ष्मी बाई स्मारक स्थल पर वीरांगना लक्ष्मी बाई की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। इसमें वह घोड़े पर सवार, पीठ पर अपने बच्चे को बांधे और हाथ में तलवार लिए युद्ध की मुद्रा में हैं।
स्मारक की दीवारों पर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी... लिखी गई हैं। गेट पर नगर निगम का चौकीदार है जो स्मारक पर आने वालों को इसके बारे में जानकारी देता है।
पेशवा महल को हेरिटेज घोषित करे सरकार
दीपदान कर दी श्रद्धांजलि
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महारानी लक्ष्मीबाई के भदैनी स्थित जन्मस्थान पर कुछ जगह को घेरकर स्मारक बनवा दिया गया है। मगर लंबे समय से चल रही शौर्यकेंद्र की मांग पूरी नहीं हो रही है। लोगों का कहना है कि कि पूरे स्थान को इतिहास और पर्यटन की दृष्टि से संरक्षित करने की आवश्कता है।
रानी लक्ष्मीबाई स्मारक, संग्रहालय और शौर्य केंद्र के लिए कई सालों से लड़ाई लड़ी जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे पेशवा महल को ही हेरिटेज घोषित कर टूरिस्ट प्लेस बना देना चाहिए।
देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी का आजादी में भी बड़ा योगदान रहा है। भारत वर्ष की स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 18 जून को भदैनी पेशवाओं के महल में हुआ। काशी में इस वीरांगना की जन्म स्थली पर स्मारक बनाकर लोगों के अंदर इतिहास को जीवंत रखने की कोशिश की है।
मगर, लंबे समय से पेशवा महल को हेरिटेज घोषित कर संरक्षित करने की मांग की जा रही है। अस्सी निवासी मनोहर, राधा प्रसाद, संजय, राजेश्वर ने बताया कि वीरांगना की जन्मस्थली अभी भी अतिक्रमण की जद में है। भदैनी स्थित पूरे पेशवा महल स्थान को ही हेरिटेज घोषित कर दार्शनिक स्थल बना देना चाहिए। पूरे स्थान को इतिहास और पर्यटन की दृष्टि से संरक्षित करने की आवश्यकता है।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली का निर्माण चार करोड़ रुपये की लागत से कराया गया था। पर्यटन विभाग ने इस स्मारक का निर्माण कराने के बाद स्मारक नगर निगम को सुपुर्द कर दिया गया।
‘गलतियां सुधारने की बजाय अपनाई जा रही गलत परंपरा’
1857 की क्रांति की नायिका वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जन्मतिथि और जन्मस्थान पर विसंगति को जान बूझकर उत्पन्न करना न केवल उस वीरांगना का अपमान है, बल्कि राष्ट्र का भी अपमान है। गलतियों को सुधारने के बजाय गलत परंपरा को लगातार निभाया जा रहा है।
काशी में रानी लक्ष्मीबाई का जन्म मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी को मणिकर्णिका परिसर में और उनका बलिदान 17 जून को बाबा गंगादास आश्रम में हुआ था। यह विचार विश्व नारी अभ्युदय संगठन की ओर से आयोजित संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह के दौरान वक्ताओं ने व्यक्त किए।
संगठन की ओर से आयोजित समारोह के दौरान वक्ताओं ने कहा कि काशी में स्थित स्मारक पर बलिदान दिवस की तारीख 18 और बिठूर में यह 19 जून कैसे दर्ज है। इन विसंगतियों के सुधार के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
इंद्रेश कुमार ने कहा कि काशी में लक्ष्मीबाई के जन्मदिवस और शौर्य दिवस का आयोजन किया जाना चाहिए और प्रमाणिक तिथि पर यह आयोजन मणिकर्णिका परिसर पर ही होना चाहिए। अतिथियों का स्वागत अध्यक्ष रीता जायसवाल ने किया।
सम्मान समारोह में नाजनीन अंसारी को रानी लक्ष्मीबाई सम्मान और राष्ट्रकुल खेलों में स्वर्णपदक विजेता मनु भाकर के पिता रामकिशन भाकर को मोरोपंत तांबे सम्मान दिया गया। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की उच्च शिक्षा को समर्पित डॉ. अनिल तिवारी को नेवालकर सम्मान दिया गया। अध्यक्षता डॉ. शशिकांत दीक्षित ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. अनिता सिंह एवं डॉ. उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने किया।