शंख ध्वनि और घंटानाद के बीच मंडप में विराजमान गौरा की चल प्रतिमा को परंपरागत रीति से हल्दी चढ़ाई जाएगी। गवनहरियों की टोली पारंपरिक मंगलगीत और सोहर गाकर पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देगी।
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उन्होंने बताया कि रंगभरी एकादशी को ब्रह्म मुहूर्त में बाबा-माता गौरा और प्रथमेश का विशेष पूजन आचार्य सुशील त्रिपाठी के आचार्यत्व में होगा। सुबह नौ बजे भोग शृंगार के बाद नौ बजे से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू हो जाएंगे। दोपहर 12:30 बजे भोग आरती होगी। शाम को पांच बजे बाबा विश्वनाथ की पालकी मंदिर से प्रस्थान करेगी और नगर भ्रमण पर निकलेगी। मार्ग में श्रद्धालु अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से बाबा और गौरा का स्वागत करेंगे। बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससुराल से अपने धाम लाते हैं।
गौना के निमित्त महंत आवास अब गौरा के मायके का रूप ले चुका है। 25 फरवरी को दोपहर तीन बजे बाबा का पालकी पूजन होगा और शाम को 6:30 बजे से षोडशी शृंगार होगा। पालकी की साफ-सफाई, रंग-रोगन और सजावट का कार्य पूर्ण हो गया है। शृंगार में पारंपरिक काशी शैली में रेशमी वस्त्र, स्वर्णाभूषण, पुष्पमालाओं और चंदन-रोली से सुसज्जित होने के बाद श्रद्धालुओं के दर्शन करेंगे।
राजसी पोशाक में पहुंचेंगे बाबा
26 फरवरी को शाम 6:30 बजे बाबा का गौना लेने गौरा-सदनिका में प्रतीकात्मक आगमन होगा। बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा को पारंपरिक राजसी पोशाक पहनाई जाएगी। बाबा विशेष देव किरीट धारण करेंगे, जिसे काशी के परंपरागत किरीट शिल्पी नंदलाल अरोड़ा सजा रहे हैं। दशाश्वमेध क्षेत्र में महादेव के राजसी वस्त्र विनोद मास्टर तैयार कर रहे हैं।