लीला प्रसंग के अनुसार, महाराज दशरथ ने दर्पण में श्वेत बाल देखकर कुलगुरु वशिष्ठ की सम्मति से श्रीराम को युवराज पद सौंपने का निर्णय लिया। अयोध्या में राजतिलक की तैयारियां देख देवराज इंद्र सशंकित हो उठे कि राजपद मिलने से श्रीराम का अवतारी उद्देश्य अधूरा न रह जाए। उन्होंने माता सरस्वती से हस्तक्षेप की प्रार्थना की। देव प्रेरणा से सरस्वती ने कैकेयी की दासी मंथरा की मति फेर दी। मंथरा ने कुटिल युक्तियों से कैकेयी को भड़काकर राजा दशरथ के दो वचनों की याद दिलाई और भरत के लिए राजपाठ तथा राम के लिए चौदह वर्ष के वनवास की मांग का षड्यंत्र रचा।
कुचक्र में फंसकर रानी कैकेयी कोपभवन चली गईं। उन्हें मनाने पहुंचे महाराज दशरथ ने जब कैकेयी की कठोर मांग सुनी तो वे स्तब्ध रह गए। सूर्यवंश के लिए कुल्हाड़ी न बनो की गुहार लगाते हुए राजा दशरथ विलाप करने लगे और अचेत होकर गिर पड़े। सेवक की सूचना पर पहुंचे महामंत्री सुमंत भी यह दृश्य देखकर व्याकुल हो उठे। कैकेयी के आदेश पर जब श्रीराम कोपभवन पहुंचे और उन्हें वचनों की जानकारी मिली तो उन्होंने रघुकुल की मर्यादा और पिता के वचन की रक्षा के लिए सहर्ष वन गमन स्वीकार कर लिया।
मूर्छित दशरथ ने श्रीराम को केवल अश्रुपूरित नेत्रों से गले लगाया, किंतु उनके मुख से शब्द न फूटे। वन गमन की आज्ञा लेने जब श्रीराम माता कौशल्या के पास पहुंचे तो उन्होंने पुत्र को हृदय से लगाकर चिरंजीवी होने का आशीष दिया। उसी समय सीता जी ने भी सास के चरण स्पर्श किए, जिस पर माता कौशल्या ने उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया। पूरे घटनाक्रम के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। आरती के उपरांत कोपभवन की लीला को विश्राम दिया गया।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ श्रीराम-जानकी विवाह, विदाई देख भावुक हुए श्रद्धालु
शिवपुर। रामलीला में शुक्रवार की रात श्रीराम बारात महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। फूलों से सुसज्जित रथों पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न गुरु विश्वामित्र व राजा दशरथ के साथ निकले। बैंड-बाजे, ढोल-नगाड़ों और आकर्षक विद्युत झांकियों के साथ निकली बारात का क्षेत्रीय नागरिकों ने पुष्पवर्षा, आरती और आतिशबाजी कर स्वागत किया। बारात जब जनकपुरी बने मंच पर पहुंची, तो बारातियों का पारंपरिक स्वागत हुआ।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम और माता सीता के विवाह की सभी रस्में संपन्न हुईं। जयमाला, कन्यादान और सिंदूरदान का अलौकिक दृश्य देख दर्शक भाव-विभोर हो गए। इसके बाद माता सीता के अयोध्या प्रस्थान की मार्मिक विदाई झांकी ने दर्शकों की आंखें नम कर दीं। अंत में शयन झांकी के साथ लीला को विश्राम दिया गया। देर रात तक हजारों श्रद्धालु जय श्रीराम के जयघोष लगाते रहे।