रामनगर। एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥ गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥ भगवान राम ने सबको समझाकर हर्षित भाव से गुरु के चरणकमलों में शीश नवाया। फिर गणेशजी, पार्वती जी और कैलाशपति महादेव को मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्री रघुनाथ जी वन की ओर चल पड़े। रामनगर की रामलीला के नौवें दिन भगवान राम वन के लिए प्रस्थान करते हैं।
लीला के मंचन के दौरान माता सीता पशोपेश में हैं। भगवान राम पहुंचते हैं और यह कहते हैं कि यह समय सोच में बैठने का नहीं है। शीघ्र वन चलने की तैयारी करो। सीता जी अपने सास का पैर पकड़कर कहती हैं कि मैं बहुत अभागी हूं कि जब सेवा का समय आया तो वन जा रही हूं। माता-पिता को शीश नवाकर राम, सीता और लक्ष्मण वन के लिए चल पड़ते हैं। उधर भगवान राम के वन प्रस्थान करते ही लंका में रावण को बुरा सपना दिखाई देता है। यह देखकर देवता प्रसन्न होते हैं। होश आने पर राजा दशरथ सुमंत से पूछते हैं कि राम वन को चले गए, प्राण शरीर से नहीं जाते, किस सुख के लिए भटक रहे हैं। वह रथ लेकर सुमंत को राम को बुलाने के लिए भेजते हैं। रास्ते में निषाद राज फल लेकर राम के दर्शन के लिए दौड़ पड़ते हैं। भीलनी सखियों से कहती है कि कैसे माता-पिता हैं जो इनको वन में भेज दिया। निषाद राज सभी को भोजन कराते हैं। भोजन के उपरांत राम-सीता भूमि पर शयन करते हैं। यह देखकर निषादराज रोने लगे तो लक्ष्मण ने उन्हें अपना उपदेश सुनाकर उनको मोह त्यागकर सीताराम के चरण कमलों में अनुराग करने को कहते हैं। सुबह होती है और राम जागते हैं, इसी के साथ आरती के बाद लीला को विश्राम दिया जाता है।