किले के हाथी गेट पर विदाई की रस्म निभाई गई। स्वरूपों के यहां पहुंचने पर आसन पर बैठाकर कुंवर और राज परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके चरण पखारे। कुंवर ने अपने हाथों से परोसकर जलपान कराया। इस दौरान रामायणियों ने रामचरितमानस के उत्तरकांड के शेष बचे दोहों का गायन करना शुरू किया।
भोजन ग्रहण करने के पश्चात उन्होंने उनको माला पहनाकर कुंवर द्वारा उनकी आरती उतारी गई। दक्षिणा प्रदान कर सभी मुख्य स्वरूपों को राजपरिवार द्वारा विदा कर दिया गया। इसके बाद स्वरूप हाथियों पर सवार हो कर अयोध्या पहुंचे। रामायणियों ने उत्तरकांड के शेष बचे दोहों का गायन समाप्त किया।
इसके बाद आखिरी आरती के साथ रामलीला का औपचारिक समापन हो गया। आरती में राजपरिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। इसके पूर्व सोमवार को रामलीला के इकतीसवें दिन उपवन विहार और सनक सनंदन की लीला हुई। इसी के साथ रामलीला के प्रसंगों का मंचन समाप्त हो जाता है।