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पुकारते हैं नमाजी अली शहीद हुए...

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वाराणसी। शेरे खुदा, मुश्किल कुशा हजरत अली की शहादत के 1401 साल पूरे हो गए। 19 रमजान को मस्जिदे कूफा में सुबह की नमाज अदा करते समय जालिम अब्दुर्रहमान ने जहर में बुझी तलवार से वार किया। हजरत अली लहूलुहान हो गए और दो दिन बाद यानी 21 रमजान को 40 हिजरी को इस दुनिया से रुख्सत हो गए। मगलवार को हजरत अली केचाहने वालों ने उनकी याद में मजलिस की। शाम को इफ्तार के बाद से उन्हें याद करने का सिलसिला शुरू हो गया। दर्जनों मस्जिदों में इफ्तार के बाद हजरत इमाम की शहादत की मजलिसें हुईं, जिसमें चार से पांच लोगों की ही मौजूदगी रही। विशेष इबादत आमाल भी किया गया और नौहाख्वानी और मातम भी हुआ। घरों में मौला अली के सिलसिले से नौहा और मातम जारी रहा।
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हर साल 19 रमजान को सुबह अंजुमन हैदरी चौक के जेरे इंतजाम अलम और ताबूत का जुलूस मस्जिद मीर नादे अली से सुबह की नमाज के बाद उठाया जाता है। अध्यक्ष मुर्तजा शमसी और सचिव अब्बास रिजवी शफक ने बताया कि लॉकडाउन की वजह से इस बार जुलूस नहीं उठाया जाएगा। इमानिया अरबी कालेज में होने वाली 19वीं शब की शब्बेदारी स्थगित रहेगी। अंजुमन के चार पांच लोग ही मौजूद रहे। अली समिति से सचिव फरमान हैदर ने बताया कि मौला अली की शहादत पर 20 और 21 रमजान को बड़ी संख्या में कार्यक्रम आयोजित होते हैं वो या तो स्थगित रहेंगे या चार पांच लोगों की मौजूदगी में संपन्न होंगे।
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