शोभायात्रा में शामिल भक्त।
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शोभायात्रा के प्रारंभ में श्री गणेश जी, भगवान शंकर जी, श्रीराम जी, श्रीकृष्ण जी की झांकियों के साथ-साथ देश के ऐतिहासिक शूरवीरों के स्वरूप को धारण किए हुए स्कूलों के छात्र चल रहे थे। छात्राएं भी अहिल्याबाई, रानी लक्ष्मीबाई व मीरा के रूप में सुसज्जित होकर शोभायात्रा में चार चांद लगा रही थीं।
शोभायात्रा में देश के विभिन्न प्रांतों से आई संकीर्तन मंडलियां अपनी पारंपरिक वेश-भूषा के साथ-साथ भगवदनाम संकीर्तन करते हुए भक्ति रस की वर्षा कर रही थीं। वाराणसी के साथ-साथ अयोध्या, वृंदावन, चित्रकूट से आए हुए संत भी पैदल चल रहे थे। काशी के विभिन्न संस्कृत विद्यालय के ब्रह्मचारी बटुक विद्यार्थी जय का उद्घोष करते हुए साथ में भगवा ध्वज थामे हुए चल रहे थे।
यात्रा में कर्नाटक, वृंदावन, चित्रकूट से आई साध्वियां भी भगवान रामानंदाचार्य के समरसता के संदेश को दे रही थीं। बैंड बाजे के साथ यात्रा अस्सी से जगद्गुरु रामानंदाचार्य की चरणपादुका का पूजन कर प्रारंभ हुई। शोभायात्रा लंका, दुर्गाकुंड, कबीर नगर, गांधी चौक, काश्मीरीगंज, खोजवां, शंकुलधारा, चेतमणि चौराहा व गुरुधाम होते हुए श्रीराम मंदिर पहुंची।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य की जयंती मनाई।
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शोभायात्रा के समापन पर श्रीराम मंदिर के प्रांगण में विशाल सभा का आयोजन हुआ। इसमें कबीर मठ के महंत विवेक दास, रामशरण दास, रामलोचन दास, सियाराम दास, पं. रामभरत शास्त्री, श्रवण दास, महामंडलेश्वर जालेश्वर गिरी सहित विभिन्न विद्वानों व संतों ने जगद्गुरु रामानंदाचार्य के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मध्यकालीन भारत में रामानंदाचार्य ने मुगलिया सल्तनत के खिलाफ संतों को एकजुट कर सनातन धर्म का शंखनाद किया। आज रुढ़िवादिता को छोड़कर सभी को एकजुट होकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की जरूरत है।