सूर्पणखा की नाक काटे जाने के बाद निकली खर और दूषण की सेना।
मागहु भूमि धेनु धन कोसा/सर्बस देहुं आजु सहरोसा/देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं/सोउ मुनि देउं निमिष एक माहीं....। अयोध्या के रघुकुल में जन्मे प्राणों के समान प्रिय राम, लक्ष्मण को राक्षसों के संहार के लिए वन भेजने का विश्वामित्र का प्रस्ताव सुनकर राजा दशरथ का हृदय कांप उठा। अयोध्या के राजमहल रूपी मंचस्थल पर एक तरफ कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा चकित नजर आईं तो दूसरी ओर राजा दशरथ के चेहरे की कांति फीकी पड़ गई।
राजा दशरथ कहते हैं कि मुनिवर! आप पृथ्वी, गो, धन, खजाना मांग लीजिए। देह और प्राण से प्यारा कुछ नहीं होता, उसे भी मैं पल भर में दे दूंगा लेकिन कहां डरावने, क्रूर राक्षस और कहां ये सुकुमार मेरे सुंदर पुत्र। इन्हें मत मांगिए। लेकिन विश्वामित्र के हठ के बाद गुरु वशिष्ठ के समझाने पर उन्होंने राम, लक्ष्मण को आशीर्वाद देकर ऋषि को सौंप दिया। इसी के साथ अयोध्या के मैदान से भीड़ पीढ़ा, छाता, छड़ी लिए छंटने लगी। कोई गलियों से निकला तो कोई सड़क से। देखते-देखते वाजिदपुर के कीचड़ से भरे दलदले मैदान में ताड़का-सुबाहु और उसी सेना का वध देखने के लिए लीला प्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा।
लीला के मंचन में मुनि के साथ वन से गुजरते समय राक्षसी ताड़का उन पर झपट पड़ी। राक्षसों की सेना के साथ ताड़का ने राम, लक्ष्मण को डराने की कोशिश की लेकिन भगवान ने एक ही बाण से उसका संहार कर दिया। इस दौरान पटाखे फूटे। इसके बाद मारीच सेना लेकर दौड़ता है लेकिन उसे भी भगवान बिना फल के बाण से समुद्र पार फेंक देते हैं। अहिल्या तारण के बाद जनकपुरी के मैदान में गंगा दर्शन, मिथिला प्रवेश और जनक दर्शन की मोहक लीला मंचित की गई।