कई विषयों की पढ़ाई से आएगी वैज्ञानिकता
उन्होंने कहा कि इन दिनों विद्यार्थियों को बहु-विषयक (मल्टी डिसिप्लिनरी) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे भारत के प्राचीन इतिहास और सभ्यता को वैज्ञानिक और वृहद स्तर पर समझा जा सकेगा। उन्होंने भारत में डीएनए फिंगरप्रिंट के जनक वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह का उदाहरण दिया।
बताया कि डॉ. लालजी सिंह की प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम में हुई थी, फिर भी उन्हें अपना शोध अंग्रेजी में प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई नहीं महसूस हुई। प्रो. शिंदे ने कहा कि मातृभाषा को बढ़ावा देना देश के पूर्ण विकास के लिए जरूरी है। अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाने से ही हम अपनी पहचान को और मजबूत कर सकते हैं।
भाषा कहती है मन की बात, फिर कैसा विवाद
प्रो. शिंदे के संबोधन के बाद छात्र और छात्राओं ने कविताओं का पाठ किया। मन कहता है, ममता के आंचल में भर लूं उसे..., भाषा तो कहती है मन की बात, फिर कैसा वाद-विवाद..., हिंदी बहन, तू टेंशन न ले..., आखिर बताइए, हिंदी बोलने में शर्म क्यों आती है... आदि कविताओं को सुन लोगों ने खूब तालियां बजाईं।
इन्होंने किया मूल्यांकन : काव्य पाठ का मूल्यांकन डॉ. भूपेंद्र कुमार और डॉ. विवेक लाहा ने किया। इस दौरान अध्यक्ष प्रो. एम. सिंगरवेल, हिंदी प्रकाशन समिति के समन्वयक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, डॉ. चंद्रशेखर पति त्रिपाठी, डॉ. सचिन आदि मौजूद रहे।